Saturday, 17 August 2019

महाकाली कुल साधना

काली कुल की सर्वोच्च दैवीय शक्ति, "आद्या शक्ति महा काली", अंधकार से जन्मा होने के परिणामस्वरूप, ये शक्ति तमोगुणी तथा काले वर्ण वाली हैं।
इस चराचर ब्रह्माण्ड या जगत के उत्त्पन्न होने से पूर्व, सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था, व्याप्त घनघोर अंधकार से उत्पन्न आद्या शक्ति, आदि और सर्वप्रथम शक्ति हुई। ऐसा माना जाता हैं कि अन्धकार से जन्मा होने के परिणामस्वरूप, ये शक्ति तमोगुणी तथा काले वर्ण वाली हैं, परिणाम स्वरूप इन का नाम काली पड़ा तथा इसी काली नाम से विख्यात हुई। समय अनुसार इन्होंने ही देवताओं तथा मनुष्यों के सन्मुख उपस्थित हुए नाना समस्याओं के निदान हेतु भिन्न-भिन्न अवतार धारण किये।
समस्त चराचर ब्रह्माण्ड, तीनो लोको, को जन्म देने वाली "आद्या शक्ति काली"।
इस संपूर्ण चराचर जगत, तीनो लोको की उत्पत्ति की ये आद्या शक्ति ही कारक बानी। अंधकार से जन्म धारण करने के पश्चात्, इन के मन मैं इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जन्म देने की प्रेरणा जाग्रत हुई और ये उद्धत हुई। इसी प्रेरणा शक्ति को श्री गणेश भी कहाँ जाता हैं जिस का सम्बन्ध किसी कार्य के शुभ प्रारम्भ हेतु हैं। इन्हीं आद्या शक्ति की प्रेरणा स्वरूप तीनो लोको तथा संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। ब्रह्माण्ड मैं ऊर्जा संचय हेतु सूर्य देव का निर्माण किया गया, जिन के ऊर्जा से समस्त चराचर जगत विद्यमान हैं। त्रिगुणात्मक प्राकृतिक गुणों की सृष्टि की गई, जो राजस, सत्व तथा तामस नाम से जानी गई तथा समस्त तत्वों के क्रमशः उत्पन्न, पालन और संहार का कारक बानी। इन गुणों के निमित्त स्वामी, कार्य-भार का सञ्चालन हेतु त्रि-देवो ( ब्रह्मा, विष्णु, महेश या शिव ) तथा त्रि-देविओ ( महा लक्ष्मी, महा सरस्वती, महा काली ) को इन्हीं आद्या शक्ति ने जन्म दिया। तीनो लोको के सुचारु सञ्चालन हेतु, ३३ कोटि या प्रकार से देवताओं, प्रजापतिओ, ग्रह तथा नक्षत्र, सम्पूर्ण जीवित प्राणी तथा अन्य तत्वों का जन्म इन्हीं आद्या शक्ति के प्रेरणा स्वरूप हुई।
"आद्या शक्ति काली" भौतिक स्वरूप।
देवी का स्वरूप अत्यंत भयानक तथा डरावना हैं, विभिन्न ध्यान मंत्रो के अनुसार; देवी का स्वरूप अत्यंत विकराल हैं। देवी, प्राणशक्ति रुप में, शिव रूपी शव के ऊपर आरूढ़ हैं, परिणामस्वरूप देह शक्ति सम्पन्न या प्राण युक्त हैं। भक्तों के विकार शून्य ह्रदय, जहाँ समस्त प्रकार के विकारो को जलाया जाता हैं या विकार दाह रूपी श्मशान में वास करती हैं। परिणामस्वरूप, देवी श्मशान वासी हैं।
काले वर्ण वाली ये देवी, अपने विकराल दाँतो तथा मुँह से लपलपाती हुई लाल रक्त वर्ण जैसी जिव्हा, से अत्यंत भयंकर प्रतीत हो रही हैं। दुष्ट दानवो का रक्त पान करने के परिणामस्वरूप इन के जिव्हा लाल रक्त वर्ण की हैं, तीन बड़ी बड़ी भयंकर नेत्रों वाली जो सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि के प्रतिक हैं। इनके ललाट पर अमृत के सामान चन्द्रमा स्थापित हैं तथा काले घनघोर बादलो समान बिखरे केशो से अत्यंत ही घनघोर प्रतीत हो रही हैं। असुर जो स्वाभाव से ही दुष्ट थे, उन असुरो के हाल ही में कटे हुए सरो कि माला इन्होंने धारण कर रखी हैं तथा प्रत्येक सर से रक्त के धार बह रही हैं। अपने दोनों बाएँ हाथों में इन्होंने खड़ग तथा दुष्ट मानव (असुर) का कटा हुआ सर धारण कर रखा हैं तथा बाएँ हाथों से ये सज्जनों को अभय तथा आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। देवी अपनी लज्जा निवारण हेतु, युद्ध में मारे गए दानवो के कटे हुए हाथों की माला बना कर, धारण कर राखी हैं तथा प्रत्यालीढ़ मुद्रा में, अपने भैरव महा काल या पति शिव के छाती में खड़ी हैं, जैसे वे काल का भी भक्षण कर रही हो। स्वरूप अनुसार देवी दो प्रकारों से दिखाई देती है, दक्षिणा काली रूप में देवी कि चार भुजायें है तथा महा काली रूप में देवी कि २० भुजायें हैं।


'काल' जो स्वयं ही मृत्यु के कारक हैं, उनका भी भक्षण करने में समर्थ हैं महा शक्ति महा काली।

आद्या शक्ति देवी का नाम काली पड़ने का कारण।

कालिका पुराण (काली से संबंधित एक पौराणिक पाठ्य पुस्तक) के अनुसार, सभी देवता एक बार हिमालय में मातंग मुनि के आश्रम के पास गए और आद्या शक्ति या महामाया की स्तुति करने लगे। सभी देवताओं द्वारा की गई वंदना तथा स्तुति से प्रसन्न हुई तथा एक काले रंग की विशाल पहाड़ जैसी स्वरूप वाली, दिव्य नारी, सभी देवताओं के सन्मुख प्रकट हुई। देखने में से शक्ति अमावस्या के अंधकार वाली थी परिणामस्वरूप क्योंकि वह शक्ति काली के नाम से विख्यात हुई। सर्वप्रथम, अंधकार से जन्म धारण करने के परिणामस्वरूप इन का नाम काली पड़ा तथा तमो गुण सम्पन्न हुई।

अग्नि और गरुड़ पुराण ( अग्नि देव और गरुड़ पक्षी, जो भगवान विष्णु के वाहन हैं, के लिए समर्पित पाठ्य पुस्तक) के अनुसार आद्या शक्ति 'काली' की साधना, युद्ध में सफलता और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के हेतु की जाती हैं। देवी का पतला शरीर, जहरीला दांत, जोर से अटृहास, पागल महिला के स्वरूप में नृत्य करने के परिणामस्वरूप, वे बहुत भयानक शारीरिक उपस्थिति प्रस्तुत कर रही हैं। उनके कटे हुए राक्षसों के मस्तकों की माला पहनने, भूत और प्रेतों के साथ श्मशान भूमि में निवास करने के परिणामस्वरूप देवी अन्य सभी देवी देवताओं में भयंकर प्रतीत होती हैं।
काली के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा।

कालिका पुराण के अनुसार, काली के दो स्वरूप हैं, प्रथम आद्या शक्ति काली तथा द्वितीय केवल पौराणिक काली। आद्या शक्ति काली या दक्षिणा काली, अजन्मा तथा सर्वप्रथम शक्ति हैं, जिन से इस सम्पूर्ण चराचर जगत की उत्पत्ति हुई हैं तथा समस्त जगत की स्वामिनी हैं। द्वितीय देवी दुर्गा या शिव पत्नी सती से सम्बंधित हैं तथा दुर्गा जी के भिन्न भिन्न स्वरूपों में से एक हैं, ये वही हैं जिन का प्रादुर्भाव अम्बिका के ललाट से हुआ हैं, तथा तमोगुण की स्वामिनी हैं। परन्तु, वास्तविक रूप से देखा जाये तो ये एक ही हैं।

दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डये पुराण के अंतर्गत एक भाग, आद्या शक्ति के विभिन्न अवतारों की शौर्य गाथा से सम्बंधित पौराणिक पाठ्य पुस्तक), एक समय समस्त त्रि-भुवन, स्वर्ग, पाताल तथा पृथिवी, शुम्भ और निशुम्भ (दो भाई) नामक राक्षसों के अत्याचार से ग्रस्त थे। व्याप्त समस्या के समाधान हेतु, सभी देवता एक हो हिमालय के पास गये और देवी आद्या-शक्ति की स्तुति, वंदना करने लगे। परिणामस्वरूप कौशिकी नाम की एक नारी शक्ति जो कि, शिव की पत्नी गौरी या पार्वती मैं समाई हुई थी, समस्त देवताओं के सन्मुख प्रकट हुई। शिव अर्धाग्ङिनी पार्वती से विभक्त, उदित वह शक्ति घोर काले वर्ण की थी तथा काली नाम से जानी जाने लगी।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा (जिन्होंने दुर्गमासुर दैत्य का वध किया तथा दुर्गा नाम से जनि जाने लगी), ने शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महा राक्षसों को युद्ध में परास्त किया तथा तीनो लोको को उन दोनों भाईयो के अत्याचार से मुक्त किया। चण्ड और मुंड नामक दैत्यों ने देवी दुर्गा से युद्ध करने का आवाहन किया, परिणामस्वरूप देवी दुर्गा उन दोनों से युद्ध करने हेतु उद्धत हुई। आक्रमण करते हुए देवी, क्रोध के वशीभूत हो अत्यंत उग्र, डरावनी हो गई तथा उन के मस्तक से एक काले वर्ण वाली शक्ति का प्राकट्य हुआ, जो देखने में अत्यंत ही भयानक, घनघोर डरावनी थी। ये काले वर्ण वाली देवी काली ही थी, जिन का प्राकट्य देवी दुर्गा की युद्ध भूमि में सहायता हेतु हुआ। चण्ड और मुंड के संग, हजारों संख्या में वीर दैत्य देवी से युद्ध कर रहे थे। उन महा वीर दैत्यों में, रक्तबीज नाम के एक राक्षस ने भी भाग लिया। देवी ने रक्तबीज दैत्य पर अपने समस्त अस्त्र-शास्त्रो से आक्रमण किया, परिणामस्वरूप दैत्य रक्तबीज के शरीर से रक्त का स्राव होने लगा। रक्त की प्रत्येक टपकते हुए बुंद से, युद्ध स्थल में उसी के सामान पराक्रमी तथा वीर दैत्य उत्पन्न होने लगे तथा रक्तबीज और भी अधिक पराक्रमी तथा शक्तिशाली होने लगा। देवी दुर्गा की सहायतार्थ, देवी काली ने दैत्य रक्तबीज के प्रत्येक टपकते हुए रक्त बुंदो को, जिव्हा लम्बी कर अपने मुँह पर लेना शुरू किया। परिणामस्वरूप युद्ध क्षेत्र में दैत्य रक्तबीज शक्तिहीन होने लगा, अब उस के सहायता हेतु और किसी दैत्य का प्राकट्य नहीं हो रहा था, अंततः रक्तबीज सहित चण्ड और मुंड का वध कर देवी काली तथा दुर्गा से तीनो लोको को भय मुक्त किया। देवी क्रोध वश, महाविनाश करने लगी तथा इनके द्वारा महा विनाश होने लगा, इनके क्रोध को शांत करने हेतु, भगवान शिव, युद्ध भूमि में लेट गए। नग्नावस्था में नृत्य करते हुए, जब देवी का पैर शिव जी के ऊपर आ गया और उन्हें लगा की वो अपने पति के ऊपर खड़ी हैं तथा लज्जा वश देवी का क्रोध शांत हुआ।
महा शक्ति काली से सम्बंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य।

देवी काली की आराधना, पूजा इत्यादि भारत के पूर्वी प्रांतो में अधिकतर होती हैं। देवी काली समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा पूजित हैं, जनजातीय तथा युद्ध कौशल से सम्बंधित समाज की देवी अधिष्ठात्री हैं। चांडाल जो की हिन्दू धर्म के अनुसार, श्मशान में शव के दाह का कार्य करते हैं तथा अन्य शूद्र जातियों की देवी अधिष्ठात्री हैं। डकैती जैसे अमानवीय कृत्य करने वाले भी देवी की पूजा करते हैं, आदि काल में डकैत, डकैती करने हेतु जाने से पहले देवी काली की विशेष पूजा अराधना करते थे। देवी का सम्बन्ध क्रूर कृत्यों से भी हैं, परन्तु ये क्रूर कृत्य दुष्ट प्रवृति के जातको हेतु ही हैं। इस निमित्त वे देवी के भव्य मंदिरों का भी निर्माण करवाते थे तथा विधिवत पूजा अराधना की संपूर्ण व्यवस्था करते थे। आज भी भारत वर्ष के विभिन्न प्रांतो में ऐसे मंदिर विद्यमान हैं, जहा डकैत, देवी की अराधना, पूजा इत्यादि करते थे। हुगली जिले में डकैत काली बाड़ी, जलपाईगुड़ी जिले की देवी चौधरानी (डकैत) काली बाड़ी इत्यादि, प्रमुख डकैत देवी मंदिर विद्यमान हैं। स्कन्द (कार्तिक) पुराण, के अनुसार देवी की उत्पत्ति, आश्विन मास की कृष्णा चतुर्दशी तिथि, मध्य रात्रि के घोर में अंधकार से हुआ। परिणामस्वरूप अगले दिन कार्तिक अमावस्या को उन की पूजा, अराधना तीनो लोको में की जाती हैं, ये पर्व दीपावली या दिवाली नाम से विख्यात हैं तथा समस्त हिन्दू समाजों द्वारा मनाई जाती हैं। शक्ति तथा शैव समुदाय के अनुसरण करने वाले इस दिन देवी काली की पूजा करते हैं तथा वैष्णव समुदाय महा लक्ष्मी जी की, वास्तव में महा काली और महा लक्ष्मी दोनों एक ही हैं। देवी काली की अराधना भारत के पूर्वी भाग मैं अधिक होती हैं। वहाँ जहा तहा देवी काली के मंदिर देखे जा सकते हैं, प्रत्येक श्मशान घाटो में देवी, मंदिर विद्यमान हैं तथा विशेष तिथिओं में पूजा, अर्चना भी होती हैं।

दसो महाविद्याये, देवी आद्या काली के ही उग्र तथा सौम्य रूप में विद्यमान हैं, देवी काली अपने अनेक अन्य नमो से प्रसिद्ध हैं, जो की भिन्न भिन्न स्वरूप तथा गुणों वाली हैं।

देवी काली मुख्यतः आठ नमो से जानी जाती हैं और 'अष्ट काली', समूह का निर्माण करती हैं।
१. चिंता मणि काली
२. स्पर्श मणि काली
३. संतति प्रदा काली
४. सिद्धि काली
५. दक्षिणा काली
६. कामकला काली
७. हंस काली
८. गुह्य काली

देवी काली 'दक्षिणा काली' के नाम तथा स्वरूप से सर्व सदाहरण में, सर्वाधिक पूजित हैं।

देवी काली के दक्षिणा काली नाम पड़ने के विभिन्न कारण।
सर्वप्रथम दक्षिणा मूर्ति भैरव ने इन की उपासना की, परिणामस्वरूप देवी दक्षिणा काली के नाम से जाने जाने लगी।
दक्षिण दिशा की ओर रहने वाले यम राज या धर्म राज, देवी का नाम सुनते ही भाग जाते है, परिणामस्वरूप देवी दक्षिणा काली के नाम से जानी जाती हैं। तात्पर्य है, मृत्यु के देवता यम, जिनका राज्य या याम लोक दक्षिण दिशा में विद्यमान है, ( मृत्यु पश्चात् जीव आत्मा यम दूतों द्वारा इसी लोक में लाई जाती हैं ) देवी काली के भक्तों से दूर रहते है, मृत्यु पश्चात् यम दूत उन्हें यम लोक नहीं ले जाते हैं।
समस्त प्रकार के साधनाओ का सम्पूर्ण फल दक्षिणा से ही प्राप्त होता हैं, जैसे गुरु दीक्षा तभी सफल हैं जब गुरु दक्षिणा दी गई हो। देवी काली, मनुष्य को अपने समस्त कर्मों का फल प्रदान करती हैं या सिद्धि प्रदान करती हैं, तभी देवी को दक्षिणा काली के नाम से भी जाना जाता हैं।
देवी काली वार प्रदान करने में अत्यंत चतुर हैं, यहाँ भी एक कारण हैं।
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, पुरुष को दक्षिण तथा स्त्री को बामा कहा जाता हैं। वही बामा दक्षिण पर विजय पा, मोक्ष प्रदान करने वाली होती हैं। तभी देवी अपने भैरव के ऊपर खड़ी हैं।

देवी काली ही दो मुख्य स्वरूपों प्रथम रक्त तथा तथा कृष्ण वर्ण में अधिष्ठित हैं, कृष्ण या काले स्वरूप वाली 'दक्षिणा' नाम से तथा रक्त या लाल वर्ण वाली 'सुंदरी' नाम से जानी जाती हैं। देवी काली, काले वर्ण युक्त दक्षिणा नाम से जानी जाती हैं। मुख्यतः विध्वंसक प्रवृति धारण करने वाले समस्त देवियाँ कृष्ण या दक्षिणा कुल से सम्बंधित हैं। जैसे, देवी काली का घनिष्ठ सम्बन्ध विध्वंसक प्रवृति तथा तत्वों से हैं, जैसे देवी श्मशान वासी हैं, मानव शव तथा हड्डियों से सम्बद्ध हैं, भूत-प्रेत इत्यादि या प्रेत योनि को प्राप्त हुए, विध्वंसक सूक्ष्म तत्व देवी के संगी साथी, सहचरी हैं। यहाँ देवी नियंत्रक भी हैं तथा स्वामी भी, समस्त भूत-प्रेत इत्यादि इनकी आज्ञा का उलंघन कभी नहीं कर सकते। समस्त वेद इन्हीं की भद्र काली रूप में स्तुति करते हैं। वे निष्काम या निःस्वार्थ भक्तों के माया रूपी पाश को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर मुक्त करती हैं।

मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी कालाष्टमी कहलाती हैं, इस दिन सामान्यतः देवी काली की पूजा, अराधना की जाती हैं या कहे तो पौराणिक काली की अराधना होती हैं, जो दुर्गा जी के नाना रूपों में से एक हैं। परन्तु तांत्रिक मतानुसार, दक्षिणा काली या आद्या काली की साधना कार्तिक अमावस्या या दीपावली के दिन होती हैं, शक्ति तथा शैव समुदाय इस दिन आद्या शक्ति काली के भिन्न भिन्न स्वरूपों की आराधना करता हैं। जबकि वैष्णव समुदाय का अनुसरण करने वाले इस दिन, धनदात्री महा लक्ष्मी की अराधना करते हैं।
देवी काली को सम्बोधित करने वाली नाना शब्दों का तात्पर्य या अर्थ।

श्मशान वासिनी या वासी :तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी देवता, मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वो स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, ये वो स्थान हैं, जहाँ पांच या पञ्च महाभूत, चिद-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतो से, संसार के समस्त जीवो के देह का निर्माण होता हैं, तथा शरीर या देह इन्हीं पांच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वो स्थान हैं जहाँ, पांचो भूतो के मिश्रण से निर्मित देह, अपने अपने तत्व में विलीन हो जाते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, श्मशान भूमि को इसी कारणवश अपना निवास स्थान बनती हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक और महत्त्वपूर्ण कारण हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित ह्रदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं। मानव देह कई प्रकार के विकारो या पाशो का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारो या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। तथा मन या ह्रदय वो स्थान हैं जहाँ इन समस्त विकारो का दाह होता हैं अतः देवी काली अपने उपासको के विकार शून्य ह्रदय पर ही वास करती हैं।

चिता : मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर शव दाह करना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी ह्रदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके।

देवी का आसन : देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं। देवी की कृपा लाभ से ही, देह पर प्राण रहते हैं।

करालवदना या घोररूपा : देवी काली का वर्ण घनघोर या अत्यंत काला हैं तथा स्वरूप से भयंकर तथा डरावना हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के ह्रदय में स्थित हैं, उन्हें डरने के आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल, यमराज भी देवी से भयभीत रहते हैं।

पीनपयोधरा : देवी काली के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनो लोको का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं।

प्रकटितरदना : देवी काली के विकराल दन्त पंक्ति बहार निकले हुए हैं तथा उन दाँतो से उन्होंने अपने जिव्हा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिव्हा को, सत्व गुण के प्रतिक उज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं।

बालावतंसा : देवी काली अपने कानो में बालक के शव रूपी अलंकार धारण करती हैं या कहे तो बच्चों के शवो को देवी कानो में अलंकार रूप में पहनती हैं। यहाँ देवी बालक स्वरूपी साधक को सर्वदा अपने समीप रखती हैं। बाल्य भाव देवी को प्राप्त करने का सर्व शक्तिशाली साधन हैं।

मुक्तकेशी : देवी के बाल, घनघोर काले बादलो की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आंधी आने वाली हो।
संक्षेप में देवी काली से सम्बंधित मुख्य तथ्य।

मुख्य नाम : महाकाली।
अन्य नाम : दक्षिणा या दक्षिण काली, कामकला काली, गुह्य काली, भद्र काली इत्यादि।
भैरव : महा काल, मृत्यु के कारक देवता या मृत्यु के कारण।
तिथि : आश्विन कृष्ण अष्टमी।
भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान विष्णु।
कुल : काली कुल।
दिशा : सभी दिशाओं में।
स्वभाव : उग्र, तामसी गुण सम्पन्न।
वाहन : लोमड़ी।
तीर्थ स्थान या मंदिर : कालीघाट, कोल्कता, पश्चिम बंगाल। देवी काली का सिद्ध पीठ, ५१ सती पीठो में मान्यता प्राप्त।
कार्य : समस्त प्रकार के कार्यो का फल प्रदान करने वाली।
शारीरिक वर्ण : गहरा काला।
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शाबर धूमावती साधना

शाबर धूमावती साधना
दस महाविद्याओं में माँ धूमावती का स्थान सातवां है और माँ के इस स्वरुप को बहुत ही उग्र माना जाता है ! माँ का यह स्वरुप अलक्ष्मी स्वरूपा कहलाता है किन्तु माँ अलक्ष्मी होते हुए भी लक्ष्मी है ! एक मान्यता के अनुसार जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया तो उस यज्ञ में शिव जी को आमंत्रित नहीं किया ! माँ सती ने इसे शिव जी का अपमान समझा और अपने शरीर को अग्नि में जला कर स्वाहा कर लिया और उस अग्नि से जो धुआं उठा )उसने माँ धूमावती का रूप ले लिया ! इसी प्रकार माँ धूमावती की उत्पत्ति की अनेकों कथाएँ प्रचलित है जिनमे से कुछ पौराणिक है और कुछ लोक मान्यताओं पर आधारित है !
नाथ सम्प्रदाय के प्रसिद्ध योगी सिद्ध चर्पटनाथ जी माँ धूमावती के उपासक थे ! उन्होंने माँ धूमावती पर अनेकों ग्रन्थ रचे और अनेकों शाबर मन्त्रों की रचना भी की !
यहाँ मैं माँ धूमावती का एक प्रचलित शाबर मंत्र दे रहा हूँ जो बहुत ही शीघ्र प्रभाव देता है !
कोर्ट कचहरी आदि के पचड़े में फस जाने पर अथवा शत्रुओं से परेशान होने पर इस मंत्र का प्रयोग करे !
माँ धूमावती की उपासना से व्यक्ति अजय हो जाता है और उसके शत्रु उसे मूक होकर देखते रह जाते है !
|| मंत्र ||
ॐ पाताल निरंजन निराकार
आकाश मंडल धुन्धुकार
आकाश दिशा से कौन आई
कौन रथ कौन असवार
थरै धरत्री थरै आकाश
विधवा रूप लम्बे हाथ
लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव
डमरू बाजे भद्रकाली
क्लेश कलह कालरात्रि
डंका डंकिनी काल किट किटा हास्य करी
जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते
जाया जीया आकाश तेरा होये
धुमावंतीपुरी में वास
ना होती देवी ना देव
तहाँ ना होती पूजा ना पाती
तहाँ ना होती जात न जाती
तब आये श्री शम्भु यती गुरु गोरक्षनाथ
आप भई अतीत
ॐ धूं: धूं: धूमावती फट स्वाहा !
|| विधि ||
41 दिन तक इस मंत्र की रोज रात को एक माला जाप करे ! तेल का दीपक जलाये और माँ को हलवा अर्पित करे ! इस मंत्र को भूल कर भी घर में ना जपे, जप केवल घर से बाहर करे ! मंत्र सिद्ध हो जायेगा !
|| प्रयोग विधि १ ||
जब कोई शत्रु परेशान करे तो इस मंत्र का उजाड़ स्थान में 11 दिन इसी विधि से जप करे और प्रतिदिन जप के अंत में माता से प्रार्थना करे –
“ हे माँ ! मेरे (अमुक) शत्रु के घर में निवास करो ! “
ऐसा करने से शत्रु के घर में बात बात पर कलह होना शुरू हो जाएगी और वह शत्रु उस कलह से परेशान होकर घर छोड़कर बहुत दुर चला जायेगा !
|| प्रयोग विधि २ ||
शमशान में उगे हुए किसी आक के पेड़ के साबुत हरे पत्ते पर उसी आक के दूध से शत्रु का नाम लिखे और किसी दुसरे शमशान में बबूल का पेड़ ढूंढे और उसका एक कांटा तोड़ लायें ! फिर इस मंत्र को 108 बार बोल कर शत्रु के नाम पर चुभो दे !
ऐसा 5 दिन तक करे , आपका शत्रु तेज ज्वर से पीड़ित हो जायेगा और दो महीने तक इसी प्रकार दुखी रहेगा !
नोट – इस मंत्र के और भी घातक प्रयोग है जिनसे शत्रु के परिवार का नाश तक हो जाये ! किसी भी प्रकार के दुरूपयोग के डर से मैं यहाँ नहीं लिखना चाहता ! इस मंत्र का दुरूपयोग करने वाला स्वयं ही पाप का भागी होगा !कोई भी जप-अनुष्ठान करने से पूर्व मंत्र की शुद्धि जांचा लें ,विधि की जानकारी प्राप्त कर लें तभी प्रयास करें |गुरु की अनुमति बिना और सुरक्षा कवच बिना तो कदापि कोई साधना न करें |उग्र महाशक्तियां गलतियों को क्षमा नहीं करती कितना भी आप सोचें की यह तो माँ है |उलट परिणाम तुरत प्राप्त हो सकते हैं |अतः बिना सोचे समझे कोई कार्य न करें |पोस्ट का उद्देश्य मात्र जानकारी उपलब्ध करना है ,अनुष्ठान या प्रयोग करना नहीं |अतः कोई समस्या होने पर हम जिम्मेदार नहीं होंगे |.................................
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