About The Best Astrologer In Muzaffarnagar, India -Consultations by Astrologer Consultations by Astrologer - Pandit Ashu Bahuguna Skills : Vedic Astrology , Horoscope Analysis , Astrology Remedies , Prashna kundli IndiaMarriage Language: Hindi Experience : Exp: 35 Years Expertise: Astrology , Business AstrologyCareer Astrology ,Court/Legal Issues , Property Astrology, Health Astrology, Finance Astrology, Settlement , Education http://shriramjyotishsadan.in Mob +919760924411
मंगलवार, 16 अप्रैल 2019
भूतबाधा निवारण का गंडा अगर आप भूत बाधा से पीड़ित हैं तो निम्न प्रकार से तैयार किया गया गंडा इससे मुक्ति दिलाएगा : रविवार के दिन स्नान कर के तुलसी के आठ पत्ते, आठ काली मिर्च और सहदेवी की जड़ एकत्रित कर लें। इन तीनों वस्तुओं को काले कच्चे सूत में बाँधकर गंडा तैयार करें। गंडे को गले में धारण कर लें। किसी परिचित को भूतबाधा से मुक्ति दिलाना : रविवार के दिन सफेद सूत और काले धतूरे का गंडा बना लें। अब इसे पीड़ित व्यक्ति की दायीं बाँह में बाँध दें, वह भूत-प्रेत की बाधा से मुक्त हो जाएगा। वायव्य आत्माओं से मुक्ति का गंडा : काले सूत के द्वारा सफेद घुंघुची की जड़ अथवा काले धतुरे की जड़ का गंडा बनाएँ। इस गंडे को दाएँ हाथ में बाँधें। अपकी समस्त वायव्य आत्माओं से ग्रस्त पीड़ा दूर हो जाएगी। यह प्रयोग किसी भी दिन किया जा सकता है। शनिवार को अगर किया जाए तो अधिक फलदायी होता है।
तलिस्मान का मतलब होता है भाग्यवर्धक वस्तुयें। जिस प्रकार से प्रकृति ने बीमारियां प्रदान की है,उसी प्रकार से प्रकृति ने बीमारियों के निवारण के लिये दवाइयां भी प्रदान की हैं। उसी प्रकार से प्रकृति ने दुर्भाग्य पैदा किया है तो सौभाग्य को देने के लिये संसार में वस्तुयें और जीवों की भी रचना की है। बीमारियों का पता जैसे एक डाक्टर अपनी विद्या के अनुसार लगा लिया करता है उसी प्रकार से दुर्भाग्य का पता एक ज्योतिषी अपनी विद्या के द्वारा पता कर लेता है,डाक्टर को सांइस ने भौतिक द्रष्टा होने के कारण डिग्री दी है लेकिन ज्योतिष को भौतिक द्र्ष्टा नही होने के कारण डिग्री नही दी है,ज्योतिष का ज्ञान केवल व्यवहारिक ज्ञान होता है,जिस प्रकार से मनुष्य ने अपनी प्रकृति को प्राचीन काल से लेकर आज तक के समय में बदल लिया है,उसी प्रकार से ज्योतिष ने अपना रूप भी मनुष्य के अनुसार बदल लिया है।
१. पीली सरसों, गुग्गल, लोबान व गौघृत इन सबको मिलाकर इनकी धूप बना लें व सूर्यास्त के 1 घंटे भीतर उपले जलाकर उसमें डाल दें। ऐसा २१ दिन तक करें व इसका धुआं पूरे घर में करें। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं। २. जावित्री, गायत्री व केसर लाकर उनको कूटकर गुग्गल मिलाकर धूप बनाकर सुबह शाम २१ दिन तक घर में जलाएं। धीरे-धीरे तांत्रिक अभिकर्म समाप्त होगा। ३. गऊ, लोचन व तगर थोड़ी सी मात्रा में लाकर लाल कपड़े में बांधकर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें। शिव कृपा से तमाम टोने-टोटके का असर समाप्त हो जाएगा। ४. घर में साफ सफाई रखें व पीपल के पत्ते से ७ दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें व तत्पश्चात् शुद्ध गुग्गल का धूप जला दें। ५. कई बार ऐसा होता है कि शत्रु आपकी सफलता व तरक्की से चिढ़कर तांत्रिकों द्वारा अभिचार कर्म करा देता है। इससे व्यवसाय बाधा एवं गृह क्लेश होता है अतः इसके दुष्प्रभाव से बचने हेतु सवा 1 किलो काले उड़द, सवा 1 किलो कोयला को सवा 1 मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से २१ बार घुमाकर शनिवार के दिन बहते जल में विसर्जित करें व मन में हनुमान जी का ध्यान करें। ऐसा लगातार ७ शनिवार करें। तांत्रिक अभिकर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा। ६. यदि आपको ऐसा लग रहा हो कि कोई आपको मारना चाहता है तो पपीते के २१ बीज लेकर शिव मंदिर जाएं व शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाकर धूप बत्ती करें तथा शिवलिंग के निकट बैठकर पपीते के बीज अपने सामने रखें। अपना नाम, गौत्र उच्चारित करके भगवान् शिव से अपनी रक्षा की गुहार करें व एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जपें तथा बीजों को एकत्रित कर तांबे के ताबीज में भरकर गले में धारण कर लें। ७. शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो नींबू को ४ भागों में काटकर चौराहे पर खड़े होकर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए चारों दिशाओं में एक-एक भाग को फेंक दें व घर आकर अपने हाथ-पांव धो लें। तांत्रिक अभिकर्म से छुटकारा मिलेगा।
ब्रह्म विद्या को जाने बिना कोई भी विद्या मे पारंगत नही हो पाता है,तालू और नाक के स्वर से जो शक्ति का निरूपण अक्षर के अन्दर किया जाता है वही ब्रह्मविद्या का रूप है। बीजाक्षरों को पढते समय बिन्दु का प्रक्षेपण करने से वह ब्रह्मविद्या का रूप बन जाता है.ब्रह्मविद्या का नियमित उच्चारण अगर एक मंदबुद्धि से भी करवाया जाये तो वह भी विद्या में उसी तरह से पारंगत हो जाता है जैसे महाकवि कालिदास जी विद्या में पारंगत हुये थे। गणेशजी के नाम के साथ ब्रह्मविद्या का उच्चारण ऊँ गं गणपतये नम: का जाप करते वक्त "गं" अक्षर मे सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या का निरूपण हो जाता है,गं बीजाक्षर को लगातार जपने से तालू के अन्दर और नाक के अन्दर जमा मल का विनास होता है और बुद्धि की ओर ले जाने वाली शिरायें और धमनियां अपना रास्ता मस्तिष्क की तरफ़ खोल देतीं है,आंख नाक कान और ग्रहण करने वाली शिरायें अपना काम करना शुरु कर देतीं है और बुद्धि का विकास होने लगता है. ब्रह्म विद्या का उच्चारण ही सर्व गणपति की आराधना है अं आं इं ईं उं ऊं ऋं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं डं. चं छं जं झं यं टं ठं डं णं तं थं दं धं नं पं फ़ं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं त्रं ज्ञं,ब्रह्म विद्या कही गयी है। उल्टा सीधा जाप करना अनुलोम विलोम विद्या का विकास करना कहा जाता है,लेकिन इस विद्या को गणेश की शक्ल में या ऊँ के रूप को ध्यान में रख कर करने से इस विद्या का विकास होता चला जाता है।
श्री कार्तवीर्यार्जुन दर्पण-प्रयोग घर से भागे हुए व्यक्ति के बारे में यदि पता न चल रहा हो, तब उसकी स्थिति व परिस्थिति जानने के लिए यह प्रयोग किया जा सकता है । वैसे तो इस प्रयोग के द्वारा चोरी गई वस्तुओम तथा उनके चोरों का भी ज्ञान पाया जा सकता है, परन्तु क्योंकि प्रयोग मँहगा तथा श्रम-साध्य है, अतः अत्यन्त जटिल परिस्थिति में ही, जब और कोई उपाय काम न आए, तभी इस ‘दर्पण-प्रयोग’ को करना चाहिए । १॰ शुभ मुहूर्त में, शुद्ध स्थानम में, शुद्ध होकर बैठ जाएँ (प्रयोग स्थान निर्वात, पर्याप्त खुला, हवादार, रोशन-दान, झरोखा आदि से युक्त होना चाहिए, ताकि ‘दीपक’ बुझे नहीं तथा दीपकों का धुँआ बाहर निकलता रहे ।) विधि-पूर्वक इच्छित कार्य की सफलता हेतु सङ्कल्प एवं श्रीगणपत्यादि पूजन करें । २॰ साधक मध्य-भाग में बैठे । अपने सामने काँसे / ताँबे की थाली / कटोरे में तैल भर कर रखे । दूसरा सहायक व्यक्ति, साधक के चारों तरफ गोल घेरे की आकृति में, एक हजार मिट्टी के बने ‘दीपक’, इस प्रकार रखे कि सभी दीपकों के मुख साधक की तरफ रहें । साधक का स्वयं का मुख, ‘उत्तर-दिशा’ की तरफ होगा तथा उसके दाहिने हाथ ‘प्रधान-दीपक’ रहेगा – ताकि ‘प्रधान-दीपक’ का मुख ‘पश्चिम’ की ओर रहे । ३॰ साधक के वस्त्र, सहायक के वस्त्र, पूजा-सामग्री – सभी लाल होनी चाहिए । लाल चन्दन या गहरे लाल मूँगे की माला, सरसों के तेल में रोली मिली बत्तियों की रुई या तो लाल रँगी या मोली-निर्मित होनी चाहिए । कमरे की दीवार या परदे लाल रंग के हो, तो अच्छा रहेगा । ‘दीपक’ मिट्टी के तथा लाल रंग के अतिरिक्त अन्य किसी रंग का दाग / धब्बा नहीं होना चाहिए । दीपकों को दूर-दूर रखें ताकि यदि किसी दीपक में तेल कम हो जाए, तो उसमें तेल डालने कि लिए या बत्ती ऊँची करने के लिए सहयोगी व्यक्ति के आने-जाने के लिए पर्याप्त स्थान रहे । बत्तियाँ बड़ी प्रयोग करे, क्योंकि दूसरी बत्ती प्रयोग नहीं की जा सकती है । ४॰ सभी ‘दीपक’ जलाकर निम्न मन्त्र का दस सहस्र जप करें - “ॐ नमो भगवते श्रीकार्तवीर्यार्जुनाय सर्व-दुष्टान्तकाय तपोबल-पराक्रम-परिपालित-सप्त-द्वीपाय, सर्व-राजन्य-चूडामणये, सर्व-शक्ति-मते, सहस्र-बाहवे हुं फट् (मम) अभिलषितं दर्शय-दर्शय स्वाहा ।” ५॰ जब तक दस सहस्र जप पूरे न हो जाए, तब तक ‘आसन’ से उठें नहीं । न कोई दीपक बुझने दें । मन व सभी इन्द्रियाँ ‘जप-काल′ में एकाग्र रखें । विशेषः- १॰ यदि भागे हुए व्यक्ति का चित्र ‘प्रयोग’ स्थान पर रख सकें, तो अच्छा रहेगा । २॰ यदि साधक को लगे कि ‘मन्त्र’ बड़ा है तथा एकासन पर पूरा जप सम्भव नहीं है, तो सहयोगी रखे जा सकते हैं । सहयोगी एक या कई हो, परन्तु सच्चरित्र व शुद्ध उच्चारण करने वाले होने चाहिए । सहयोगियों के वस्त्रादि का विधान साधक की तरह ही रहेगा । ३॰ ‘जप’ पूरा होने पर, अभिलषित व्यक्ति की हालत व स्थान आदि सामने रखे हुए तैल में प्रत्यक्ष चित्र के समान स्पष्ट हो जाते हैं । ४॰ प्रयोग को दिग्-दर्शन मानें, केवल पढ़ कर उपयोग में न लें, किसी विद्वान के मार्ग-दर्शन में ही उपयोग करें ।...
यदि आपके लाख प्रयत्नों के उपरान्त भी आपके सामान की बिक्री निरन्तर घटती जा रही हो, तो बिक्री में वृद्धि हेतु किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के गुरुवार के दिन से निम्नलिखित क्रिया प्रारम्भ करनी चाहिए - व्यापार स्थल अथवा दुकान के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से धोकर स्वच्छ कर लें । इसके उपरान्त हल्दी से स्वस्तिक बनाकर उस पर चने की दाल और गुड़ थोड़ी मात्रा में रख दें । इसके बाद आप उस स्वस्तिक को बार-बार नहीं देखें । इस प्रकार प्रत्येक गुरुवार को यह क्रिया सम्पन्न करने से बिक्री में अवश्य ही वृद्धि होती है । इस प्रक्रिया को कम-से-कम 11 गुरुवार तक अवश्य करें ।
यदि कोई शत्रु आपसी जलन या द्वेष, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के कारण आप पर तंत्र-मंत्र का कोई प्रयोग करके आपके व्यवसाय में बाधा डाल रहा हो, तो ईसे में नीचे लिखे सरल शाबर मंत्र का प्रयोग करके आप अपनी तथा अपने व्यवसाय की रक्षा कर सकते हैं । सर्वप्रथम इस मंत्र की दस माला जपकर हवन करें । मंत्र सिद्ध हो जाने पर रविवार या मंगलवार की रात इसका प्रयोग करें । मंत्रः- “उलटत वेद पलटत काया, जाओ बच्चा तुम्हें गुरु ने बुलाया, सत नाम आदेश गुरु का ।” रविवार या मंगलवार की रात को 11 बजे के बाद घर से निकलकर चौराहे की ओर जाएँ, अपने साथ थोड़ी-सी शराब लेते जाएँ । मार्ग में सात कंकड़ उठाते जाएँ । चौराहे पर पहुँचकर एक कंकड़ पूर्व दिशा की ओर फेंकते हुए उपर्युक्त मंत्र पढ़ें, फिर एक दक्षिण, फिर क्रमशः पश्चिम, उत्तर, ऊपर, नीचे तथा सातवीं कंकड़ चौराहे के बीच रखकर उस शराब चढ़ा दें । यह सब करते समय निरन्तर उक्त मन्त्र का उच्चारण करते रहें । फिर पीछे पलट कर सीधे बिना किसी से बोले और बिना पीछे मुड़कर देखे अपने घर वापस आ जाएँ । घर पर पहले से द्वार के बाहर पानी रखे रहें । उसी पानी से हाथ-पैर धोकर कुछ जल अपने ऊपर छिड़क कर, तब अन्दर जाएँ । एक बात का अवश्य ध्यान रखें कि आते-जाते समय आपके घर का कोई सदस्य आपके सामने न पड़े और चौराहे से लौटते समय यदि आपको कोई बुलाए या कोई आवाज सुनाई दे, तब भी मुड़कर न देखें ।
श्रीसुदर्शन-चक्र-विद्या १॰ रोग, बाधा-निवारक प्रयोग अपने सामने भगवान् विष्णु या भगवान् कृष्ण या भगवान् दत्तात्रेय की मूर्ति रखे। यथा-शक्ति मूर्ति का पूजन करे। पहले से तैयार व सिद्ध ‘श्रीसुदर्शन-चक्र’ का पूजन करे। पूजन में गो-घृत का दीपक, सुन्धित धूप, श्वेत पदार्थों का नैवेद्य (दूध-शक्कर, दूध-भात, दही-भात, खीर आदि) तथा पुष्प चढ़ाए। पूजन के बाद प्रार्थना करे। बाधा, रोग-निवारण हेतु विधिवत् संकल्प कर जल छोड़े। फिर पहले से तैयार सिद्ध किए हुए ‘श्रीसुदर्शन-चक्र’ को किसी विद्युत-पंखे के ब्लेड्स निकालकर रॉड में चक्र को स्क्रू द्वारा पक्का किया जा सकता है। अब इस ‘चक्र’ लगे पंखे को चालू करके उसके सामने ताँबे या चाँदी के पात्र में गंगा-जल रखे। पात्र में रखे गंगा-जल के ऊपर हाथ रखकर ‘श्रीसुदर्शन-चक्र-माला-मन्त्र‘ को १ या ३ या ११ या १८ बार पढ़े। पढ़ने के बाद पंखे को बन्द करे और सुदर्शन-चक्र द्वारा अभिमन्त्रित जल को काँच की बोतल में भर-कर पवित्र स्थान में सुरक्षित रखे। इस जल को अभिचार-बाधा, पिशाच-बाधा या असाध्य बाधा से ग्रस्त व्यक्ति को तीन दिन आचमन-स्वरुप देने से बाधाएँ नष्ट होंगी। अधिक दिन प्रयोग करने पर पक्षाघात, धनुर्वात (टिटेनस) के रोग भी दूर हो सकते हैं। अभीमन्त्रित जल के मण्डल (वृत्त) में रोगी को रखने से भी बाधाएँ नष्ट होती है। उक्त प्रकार से ‘सुदर्शन-चक्र-माला-मन्त्र’ द्वारा औषधियों को भी अभिमन्त्रित किया जा सकता है। इससे रोगी को शीघ्र लाभ होता है। विभूति को अभिमन्त्रित कर बाधा-ग्रस्त व्यक्ति को अपने पास रखने हेतु दिया जा सकता है। इससे अभिचार-प्रयोगों का प्रभाव पूर्णतया नष्ट हो जाता है। अभिमन्त्रित जल का प्रोक्षण (मार्जन) अन्न, वस्त्र, खाद्य-पदार्थ आदि पर करने से उनके दोष भी दूर होते हैं। अभिचार-पीडित व्यक्ति को उक्त प्रकार से अभिमन्त्रित जल से क्रोध-पूर्वक प्रताडित करने से अभिचार तुरन्त दूर होता है।रक्षा-प्रयोग यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक बीमार हो या बाह्य-बाधा, अभिचार-प्रयोग आदि द्वारा विशेषतया पीड़ित हो, तो उसके लिए निम्न प्रकार से ‘रक्षा-प्रयोग’ करना चाहिए। ‘प्रयोग’ हेतु शुभ दिन, शुभ मुहूर्त आदि देखने की आवश्यकता नहीं है। प्रयोग ब्राह्म-मुहूर्त में प्रारम्भ करे। स्नान आदि से पवित्र होकर पहले ‘विनियोग’ आदि सहित ‘श्रीसुदर्शन-चक्र’ का पूजन करे। ‘विनियोग’ में, जिस व्यक्ति के लिए प्रयोग करना है, उसके नाम सहित रक्षा या संकट मुक्ति हेतु कहे। पूजन के बाद ‘श्रीसुदर्शन चक्र’ को दाहिने हाथ में लेकर अथवा उस पर दाहिना हाथ रखकर ‘श्रीसुदर्शन-चक्र-माला-मन्त्र’ का १८ बार जप करे। प्रत्येक जप के बाद – श्रीसुदर्शन-चक्र-मन्त्रः ‘अमुक’ व्यक्ति-रक्षार्थे सम्पूर्णम्’ कहे। जप के बाद चक्र को पूजा-स्थान में ही भगवान् विष्णु, भगवान् कृष्ण या भगवान् दत्तात्रेय की मूर्ति या चित्र के नीचे रखे। चक्र तीन दिन तक वहीं रखे। यदि कुछ अनुभव-परिणाम पहले दिन से दिखने लगे, तो भी प्रयोग तीन दिन तक करे। संकट-मुक्ति के बाद व्यक्ति की शक्ति के अनुसार ‘चक्र’ का पूजन करे। पूजन का प्रसाद सभी व्यक्ति ग्रहण कर सकते हैं।
नवार्ण मंत्र की साधना के बारे में कुछ आवश्यक बाते ... • जप समर्पण योनी मुद्रा से कर तो कहीं ज्यादा अच्छा होगा . • नवरात्री के समाप्ति पर कुमारी कन्यायो को भोजन जरुर कराये . • मंत्र जप के दौरान आपकी माला किसी भी कपडे में ढंकी जरुर रहे , मतलब सामने न दिखे • जप काल में माला यदि टूट जाये तो गुरुमंत्र का जप करते हुए फिर से उसे पिरो ले .. व्यर्थ की आशंका मन में न लाये • ठीक कुछ ऐसा ही अगर कभी गलती से सामने जल रहा दिया यदि बुझ जाए तो . • सारी प्रक्रिया के शुरू और अंत में सद्गुरुदेब का कवच जिसे हम निखिल कवच या निखिलेश्वरानंद कवच के नाम से जानते हैं उसका पाठ जरुर करे यह आपकी सधान्त्मक उर्जा की क्षरण करने से रोकता हैं • हर दिन एक बार सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ जरुर करें और इस स्त्रोत के एक बार के पाठ के बाद एक माला नवार्ण मंत्र की जरुर करे . • सुगन्धित अगरबत्ती का प्रयोग कर सकते हैं तो अवश्य करें. • नवार्ण मंत्र में ओं शब्द न लगाये . • जब आहुति दे रहे हो तो स्वाहा का उच्चारण जरुर करे .हवन की भस्म भी पवित्र होती हैं इससे झाड़ने से या तिलक लगाने से अनेको समस्याए स्वतः ही दूर हो जाति हैं . • ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे भूमि शयन यदि कर सकते हैं तो अवश्य करे . • मंत्र जप करने से पहले माला को अपने माथे से अवश्य स्पर्श करा लेना चाहिए .. • माला यन्त्र अदि को जानवरों के संपर्क से बचाना चाहिए . • नवरात्री काल का हर क्षण हर पल बहुत ही पवित्र हैं तो हर पल का उपयोग किया जा सकता हैं . पर यदि मंत्र जप रात्रि काल में हो तो बहुत ही अच्छा होगा . • ये सरल से नियम हैं इनका पालन करे और ज्यादा से ज्यादा आपको लाभ मिले ……….
इसके अलावा कइ अन्य पदार्थ भी शिवलिंग पर चढाये जाते हैं, जिनमें से कुछ के विषय में निम्नानुसार मान्यतायें हैं:- सहस्राभिषेक एक हजार कनेर के पुष्प चढाने से रोगमुक्ति होती है । एक हजार धतूरे के पुष्प चढाने से पुत्रप्रदायक माना गया है । एक हजार आक या मदार के पुष्प चढाने से प्रताप या प्रसिद्धि बढती है । एक हजार चमेली के पुष्प चढाने से वाहन सुख प्राप्त होता है । एक हजार अलसी के पुष्प चढाने से विष्णुभक्ति व विष्णुकृपा प्राप्त होती है । एक हजार जूही के पुष्प चढाने से समृद्धि प्राप्त होती है । एक हजार सरसों के फूल चढाने से शत्रु की पराजय होती है । लक्षाभिषेक एक लाख बेलपत्र चढाने से कुबेरवत संपत्ति मिलती है । एक लाख कमलपुष्प चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है । एक लाख आक या मदार के पत्ते चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है । एक लाख अक्षत या बिना टूटे चावल चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है । एक लाख उडद के दाने चढाने से स्वास्थ्य लाभ होता है । एक लाख दूब चढाने से आयुवृद्धि होती है । एक लाख तुलसीदल चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है । एक लाख पीले सरसों के दाने चढाने से शत्रु का विनाश होता है ।
आपकी समस्याएं- - क्या आप अपने जीवन से तंग आ चुके हैं? - क्या आप धन की कमी से परेशान हैं? - क्या आप पारिवारिक कलह से झुंझलाहट व क्रोध में रहते हैं। - आप बच्चों की शादी से संकट में हैं? - क्या आप कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाकर थक चुके हैं? - क्या आपके ऊपर या परिजनों पर बुरी नजर लगी है? - क्या आप हमेशा भाग्य को दोष देते रहते हैं? - क्या आपका व्यापार-धंधा, उद्योग ठप है? - क्या आपको नौकरी में प्रमोशन नहीं मिल रहा? - क्या आप किसी को अपने वश में करना चाहते हैं? - क्या आपकी जमीन, जायदाद जबरन हड़प ली है? - क्या आप कोई नई नौकरी की तलाश में हैं? - क्या आप एक अच्छा इंसान बनना चाहते हैं? - क्या आपको मकान बनवाने में कई अड़चनें आ रही हैं? - क्या आप अपनी धर्मपत्नी से परेशान हैं? - क्या आप अपने पति की बुरी आदतें सुधारना चाहती हैं? - क्या आपका बच्चा/बच्ची गुम हो गया है और सब प्रयासों के बावजूद वह नहीं मिल रहा है। - क्या आप लव-मैरिज करना चाहते हैं? - क्या आप अपनी सास को सुधारना चाहती हैं? - क्या आपका कहना आपके बच्चे नहीं मानते? - क्या आप अपने बच्चों को परीक्षा में अच्छे नंबर दिलाना चाहते हैं? - क्या आप बार-बार दुर्घटना के शिकार हो रहे हैं? - क्या आपके घर में बार-बार दुर्घटनाएं घटित हो रही हैं? …
मनोकामना पूर्ति के अचूक गुप्त उपाय हर मनुष्य की कुछ मनोकामनाएं होती है। कुछ लोग इन मनोकामनाओं को बता देते हैं तो कुछ नहीं बताते। चाहते सभी हैं कि किसी भी तरह उनकी मनोकामना पूरी हो जाए। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। यदि आप चाहते हैं कि आपकी सोची हर मुराद पूरी हो जाए तो नीचे लिखे प्रयोग करें। इन टोटकों को करने से आपकी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी। उपाय—- - तुलसी के पौधे को प्रतिदिन जल चढ़ाएं तथा गाय के घी का दीपक लगाएं। - रविवार को पुष्य नक्षत्र में श्वेत आक की जड़ लाकर उससे श्रीगणेश की प्रतिमा बनाएं फिर उन्हें खीर का भोग लगाएं। लाल कनेर के फूल तथा चंदन आदि के उनकी पूजा करें। तत्पश्चात गणेशजी के बीज मंत्र (ऊँ गं) के अंत में नम: शब्द जोड़कर 108 बार जप करें। - सुबह गौरी-शंकर रुद्राक्ष शिवजी के मंदिर में चढ़ाएं। - सुबह बेल पत्र (बिल्ब) पर सफेद चंदन की बिंदी लगाकर मनोरथ बोलकर शिवलिंग पर अर्पित करें। - बड़ के पत्ते पर मनोकामना लिखकर बहते जल में प्रवाहित करने से भी मनोरथ पूर्ति होती है। मनोकामना किसी भी भाषा में लिख सकते हैं। - नए सूती लाल कपड़े में जटावाला नारियल बांधकर बहते जल में प्रवाहित करने से भी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इन प्रयोगों को करने से आपकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाएंगी। जय श्री राम ------ आपका दैवज्ञश्री पंडित आशु बहुगुणा । पुत्र श्री ज्योतिर्विद पंडित टीकाराम बहुगुणा । मोबाईल न0॰है (9760924411) इसी नंबर पर और दोपहर-12.00 –बजे से शाम -07.00 -के मध्य ही संपर्क करें। मुजफ्फरनगर ॰उ0॰प्र0.•..
देवस्तुति......................................................................................................... ॐ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् | अनेकरूपं दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् || || उन विष्णु को हम वंदन करते हैं जो अजेय हैं , महाविष्णु हैं , महेश्वर है , सभीके स्वामी हैं , जो असुरों के संहार कर्ता हैं , जिनके अनेक स्वरूप हैं और जो पुरुषोत्तम हैं !
भोज पत्र यंत्रों के जब प्रयोग सामने आते हैं तो एक सामान्य साधक का यह सोचना स्वाभाविक हैं की इन्हें बनाया कैसे जाये . दूसरा यह भोज पत्र क्या हैं , क्या इसमें भी कुछ गुणवत्ता देखना जरुरी हैं . भोज पत्र पर यंत्र बनाना कहीं ज्यादा उचित माना गया हैं .यु तो काल अवधि को दृष्टिगत रखते हुए चांदी ताम्बे और स्वर्ण पर भी निर्माण देखने में आया गया हैं कतिपय विशष्ट यंत्रो के साथ यदि धातुओं से जुडी हुयी कुछ विशष्ट ता हैं तो यह अलग बात हैं क्योंकि हर धातु का अपना एक अलग ही गुण हैं जो मानव को प्रभावित भी करता हैं हैं कुछ धातुये अलग तत्व को तो कुछ अलग तत्वों की प्रतिनिधि होती हैं , यहाँ तत्व से तात्पर्य सत रज तम से हैं . और किसके लिए किस प्रकार की व्यवस्था हैं यह तो कोई योग्य ही सामने रख सकता हैं, क्योंकि अगर यह विज्ञानं हैं तो सारे कार्य कलाप में एक निश्चित परिणाम की प्राप्ति के लिए एक निश्चित तरीका भी तो उपयोग होगा. भोज पत्र एक वृक्ष का नाम हैं और इसकी छाल ही भोज पत्र के नाम से बिकती हैं यह एक और भूरे रंग की तो दूसरी और सफ़ेद रंग की होती हैं भूरे रंग को ही लाल कह कर बाजार में उपलब्ध कराया जाता हैं ., ध्यान रहे भोज पत्र की यह छाल जिस पर यह यन्त्र बनाया जाना हैं वह साफ़ सुथरा और टुटा फूटा न हो .और इसको बाजार से ले आये साथ ही यह तो एक कागज़ की तरह का होता हैं तो जितना बड़ा यन्त्र हो उस आकार का इसको काट कर टुकड़ा लेना चाहिए. यंत्र के प्रयोग जिनमे यंत्रो को धारण करने का निर्देश होता हैं उन्हें सामन्यतः भोज पत्र में ही बना कर फिर बाज़ार में मिल रहे विभिन्न ताबीजो के अनुसार से उनके अंदर भर कर प्रयोग करना चाहिए .ताबीज की धातु भी यदि निर्देशित हो तो उसका पालन करे या फिर जो भी धातु या त्रि धातु का आपको ठीक लगे उसका उपयोग करे .. जितना अच्छा और उच्च कोटि का भोज पत्र होगा उतना ही अच्छा हैंहाँ यदि निर्देशित हो तो आप इन यंत्रो को अच्छे से मधवा भी सकते हैं .इन यंत्रो के निर्माण के लिए महा पर्व ही नहीं बल्कि कोई भी शुभ समय लिया जा सकता हैं और इस बात की जानकारी तो आप सदगुरुदेव द्वारा रचित “काल निर्णय “ नाम के ग्रथ से जान सकतेहैं फिर भी यह भी नहीं हो पा रहा हो हर दिन दिन के १२ बजे एक महूर्त होता हैं जिसे अभिजीत महूर्त कहते हैं उस समय भी उपयोग कर सकते हैं , हलाकि जैसा निर्देशित किया गया हो उस यंत्र के निर्माण प्रक्रिया के बारे में वैसा किया भी जाना चहिये . और जब यन्त्र का निर्माण हो जाये तो अब उसकी पूजन कैसे करना हैं यह भी एक आवश्यक बात हैं क्योंकि जा की रही भावना जैसी ..
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