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Sunday, 4 January 2015

तंत्र साधना में क्यों आवश्यक है नारी

तंत्र साधना में क्यों आवश्यक है नारी
ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (अष्टक 8, मं. 10 सू. 129) में वर्णित है कि प्रारंभ में अंधकार था एवं जल की प्रधानता थी और संसार की उत्पत्ति जल से ही हुई है। जल का ही एक पर्यायवाची 'नार' है।
सृजन के समय विष्णु जलशैया पर विराजमान होते हैं और नारायण कहलाते हैं एवं उस समय उनकी नाभि से प्रस्फुटित कमल की कर्णिका पर स्थित ब्रह्मा ही संसार का सृजन करते हैं और नारी का नाभि से ही सृजन प्रारंभ होता है तथा उसका प्रस्फुटन नाभि के नीचे के भाग में स्थि‍त सृजन पद्म में होता है।
सृजन की प्रक्रिया में नारायण एवं नारी दोनों समान धर्मी हैं एवं अष्टदल कमल युक्त तथा पूर्ण हैं जबकि पुरुष केवल सप्तदल कमलमय है, जो अपूर्ण है। इसी कारण तंत्र शास्त्र में तंत्रराज श्रीयंत्र की रचना में रक्तवर्णी अष्टदल कमल विद्यमान होता है, जो नारी की अथवा शक्ति की सृजनता का प्रतीक है।
इसी श्रीयंत्र में अष्टदल कमल के पश्चात षोडशदलीय कमल सृष्टि की आद्या शक्ति 'चन्द्रा' के सृष्टि रूप में प्रस्फुटन का प्रतीक है। चंद्रमा 16 कलाओं में पूर्णता को प्राप्त करता है। इसी के अनुरूप षोडशी देवी का मंत्र 16 अक्षरों का है तथा श्रीयंत्र में 16 कमल दल उसी के प्रतीक होते हैं। तदनुरूप नारी 27 दिन के चक्र के पश्चात 28वें दिन पुन: नवसृजन के लिए पुन: कुमारी रूपा हो जाती है।
यह संपूर्ण संसार द्वंद्वात्मक है, मिथुनजन्य है एवं इसके समस्त पदार्थ स्त्री तथा पुरुष में विभाजित हैं। इन दोनों के बीच आकर्षण शक्ति ही संसार के अस्तित्व का मूलाधार है जिसे आदि शंकराचार्यजी ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया है।
शिव:शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं।
न चेदेवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि।
यह आकर्षण ही कामशक्ति है जिसे तंत्र में आदिशक्ति कहा गया है। यह परंपरागत पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मंर से एक है। तंत्र शास्त्र के अनुसार नारी इसी आदिशक्ति का साकार प्रतिरूप है। षटचक्र भेदन व तंत्र साधना में स्त्री की उपस्थिति अनिवार्य है, क्योंकि साधना स्थूल शरीर द्वारा न होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है। सूक्ष्म शरीर का तत्व ब्रह्मचारी ही जान सकता है। यह सब ब्रह्मचर्य और योगतप के बल पर ही संभव है। ब्रह्मचर्य और तप के बल पर देवताओं ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की !ब्रह्म बिंदु रूप में स्थित है, यह बिंदु ही वीर्य कहा जाता है! वीर्य रक्षा करने से जीवन का उत्कर्ष प्राप्त होता है! मरणं बिंदु पातेन , जीवनं बिंदु रक्षणात ! अर्थात बिंदु का पतन होना ही मृत्यु है और उसकी रक्षा करने से उच्चावस्था प्राप्त होती है! इसीलिए ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला ऊर्ध्वरेत्ता होता है! वह लैंगिक क्रियाओं के माध्यम से रेतस का पतन नहीं करता!
जब हम विकारों की बात करते हैं तो काम वहाँ पहले स्थान पर आता है! काम, क्रोध, लोभ और मोह! और पुरुषार्थ की चर्चा में काम तीसरे स्थान पर मिलता है! काम को विकार नहीं, ऊर्जा भाव से देखें! यह प्रकृति की जिग्जेक है! इसको यदि चित्र से बताएं तो मान लीजिए कि जीवन एक ऐसी अवस्था है जो आकुंचन और प्रसारण की योजना से कार्य करता है! या कहें कि गति के सिद्धांत पर चलता है! तो गति ऊर्ध्वगामी और अधोगामी होती है! यह गति
जन्म से अधोगामी होती है! क्योंकि मानव के जीवन चक्र को वैदिक सिद्धांत से देखते हैं तो यह चंद्रमा के अनुरूप चलता है! चंद्रमा जल का स्वामी है और जल की अधोगति होती है! प्रकाश और अग्नि की ऊर्ध्व गति होती है! जब हम आपने विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह को एक गति के रूप में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की गति से विस्फोटित करते हैं तो एक अग्नि पुंज( पुरुषार्थ) से एक विकार का विनाश हो जाता है! इस प्रकार धर्म से काम का, अर्थ से क्रोध का, काम से लोभ का विनाश होता है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है!
जब हम काम के समक्ष धर्म पथ को ग्रहण करते हैं तो काम नष्ट हो जाता है और गति ऊपर की और अग्रसर होती है! इसी क्रम में जब धर्म स्वरुप लेता है तो क्रोध को नष्ट करता है! क्रोध के नष्ट होने पर अर्थ प्राप्ति और अर्थ द्वारा लोभ नष्ट होने से पुरुषार्थ काम का सत्व सक्रिय होता है, जो मोह को नष्ट कर मोक्ष प्राप्त कराता है!

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