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Friday, 23 November 2012

tantra.

1.
अभिचार का सामान्य अर्थ है - 'हनन' तंत्रों में प्राय: छह प्रकार के अभिचारों का वर्णन मिलता है -
1. मारण, 2. मोहन, 3. स्तंभन, 4. विद्वेषण, 5. उच्चाट्टन और 6. वशीकरण।
मारण से प्राणनाश करने, मोहन से किसी के मन को मुग्ध करने, स्तंभन से मंत्रादि द्वारा विभिन्न घातक वस्तुओं या व्यक्तियों का निरोध, स्थितिकरण या नाश करने, विद्वेषण से दो अभिन्न हृदय व्यक्तियों में भेद या द्वेष उत्पन्न करने, उच्चाटन से किसी के मन को चंचल, उन्मत्त या अस्थिर करने तथा वशीकरण से राज या किसी स्त्री अथवा अन्य व्यक्ति के मन को अपने वश में करने की क्रिया संपादित की जाती की जाती है।
इन विभिन्न प्रकार की क्रियाओं को करने के लिए अनेक प्रकार के तांत्रिक कर्मो के विधान मिलते हैं जिनमें सामान्य दृष्टि से कुछ घृणित कार्य भी विहित माने गए हैं। इन क्रियाओं में मंत्र, यंत्र, बलि, प्राणप्रतिष्ठा, हवन, औषधिप्रयोग आदि के विविध नियोजित स्वरूप मिलते हैं। उपर्युक्त अभिचार अथवा तांत्रिक षट्कर्म के प्रयोग के लिए विभिन्न तिथियों का का विधान मिलता है जैसे--मारण के लिए शतभिषा में अर्धरात्रि, स्तंभन के लिए शीतकाल, विद्वेषण के लिए ग्रीष्मकालीन पूर्णिमा की दोपहर, उच्चाटन के लिए शनिवारयुक्त कृष्णा चतुर्दशी अथवा अष्टमी आदि का निर्देश है।
2.. श्रीसुदर्शन-चक्र-विद्या
१॰ रोग, बाधा-निवारक प्रयोग
अपने सामने भगवान् विष्णु या भगवान् कृष्ण या भगवान् दत्तात्रेय की मूर्ति रखे। यथा-शक्ति मूर्ति का पूजन करे। पहले से तैयार व सिद्धश्रीसुदर्शन-चक्रका पूजन करे। पूजन में गो-घृत का दीपक, सुन्धित धूप, श्वेत पदार्थों का नैवेद्य (दूध-शक्कर, दूध-भात, दही-भात, खीर आदि) तथा पुष्प चढ़ाए।
पूजन के बाद प्रार्थना करे। बाधा, रोग-निवारण हेतु विधिवत् संकल्प कर जल छोड़े। फिर पहले से तैयार सिद्ध किए हुए श्रीसुदर्शन-चक्रको किसी विद्युत-पंखे के ब्लेड्स निकालकर रॉड में चक्र को स्क्रू द्वारा पक्का किया जा सकता है। अब इस चक्रलगे पंखे को चालू करके उसके सामने ताँबे या चाँदी के पात्र में गंगा-जल रखे। पात्र में रखे गंगा-जल के ऊपर हाथ रखकर श्रीसुदर्शन-चक्र-माला-मन्त्रको १ या ३ या ११ या १८ बार पढ़े। पढ़ने के बाद पंखे को बन्द करे और सुदर्शन-चक्र द्वारा अभिमन्त्रित जल को काँच की बोतल में भर-कर पवित्र स्थान में सुरक्षित रखे। इस जल को अभिचार-बाधा, पिशाच-बाधा या असाध्य बाधा से ग्रस्त व्यक्ति को तीन दिन आचमन-स्वरुप देने से बाधाएँ नष्ट होंगी। अधिक दिन प्रयोग करने पर पक्षाघात, धनुर्वात (टिटेनस) के रोग भी दूर हो सकते हैं। अभीमन्त्रित जल के मण्डल (वृत्त) में रोगी को रखने से भी बाधाएँ नष्ट होती है।
उक्त प्रकार से सुदर्शन-चक्र-माला-मन्त्र द्वारा औषधियों को भी अभिमन्त्रित किया जा सकता है। इससे रोगी को शीघ्र लाभ होता है। विभूति को अभिमन्त्रित कर बाधा-ग्रस्त व्यक्ति को अपने पास रखने हेतु दिया जा सकता है। इससे अभिचार-प्रयोगों का प्रभाव पूर्णतया नष्ट हो जाता है। अभिमन्त्रित जल का प्रोक्षण (मार्जन) अन्न, वस्त्र, खाद्य-पदार्थ आदि पर करने से उनके दोष भी दूर होते हैं। अभिचार-पीडित व्यक्ति को उक्त प्रकार से अभिमन्त्रित जल से क्रोध-पूर्वक प्रताडित करने से अभिचार तुरन्त दूर होता है।
२॰ रक्षा-प्रयोग
यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक बीमार हो या बाह्य-बाधा, अभिचार-प्रयोग आदि द्वारा विशेषतया पीड़ित हो, तो उसके लिए निम्न प्रकार से रक्षा-प्रयोगकरना चाहिए। प्रयोगहेतु शुभ दिन, शुभ मुहूर्त आदि देखने की आवश्यकता नहीं है।
प्रयोग ब्राह्म-मुहूर्त में प्रारम्भ करे। स्नान आदि से पवित्र होकर पहलेविनियोगआदि सहितश्रीसुदर्शन-चक्र का पूजन करे। विनियोगमें, जिस व्यक्ति के लिए प्रयोग करना है, उसके नाम सहित रक्षा या संकट मुक्ति हेतु कहे।
पूजन के बाद श्रीसुदर्शन चक्रको दाहिने हाथ में लेकर अथवा उस पर दाहिना हाथ रखकर श्रीसुदर्शन-चक्र-माला-मन्त्र का १८ बार जप करे। प्रत्येक जप के बाद श्रीसुदर्शन-चक्र-मन्त्रः अमुकव्यक्ति-रक्षार्थे सम्पूर्णम्कहे। जप के बाद चक्र को पूजा-स्थान में ही भगवान् विष्णु, भगवान् कृष्ण या भगवान् दत्तात्रेय की मूर्ति या चित्र के नीचे रखे। चक्र तीन दिन तक वहीं रखे। यदि कुछ अनुभव-परिणाम पहले दिन से दिखने लगे, तो भी प्रयोग तीन दिन तक करे। संकट-मुक्ति के बाद व्यक्ति की शक्ति के अनुसार चक्रका पूजन करे। पूजन का प्रसाद सभी व्यक्ति ग्रहण कर सकते हैं।

3…माला

अन्य धर्मों की तरह सनातन (हिन्दू) धर्म में भी जप के लिए माला का प्रयोग होता है। क्योंकि किसी भी जप में संख्या का बहुत महत्त्व होता है। निश्चित संख्या में जप करने के लिए माला का प्रयोग करते हैं। माला फेरने से एकाग्रता भी बनी रहती है। वैसे तो माला के अन्य बहुत से प्रयोग हैं, लेकिन मैं यहां जप संबंधी बातें बताना चाहता हूँ।

किसी देवी-देवता के मंत्र का जप करने के लिए एक निश्चित संख्या होती है। उस संख्या का १० प्रतिशत हवन, हवन का १० प्रतिशत तर्पण, तर्पण का १० प्रतिशत मार्जन, मार्जन की १० प्रतिशत संख्या में ब्राह्मण भोजन करना होता है। इन सभी संख्यों का निर्धारण बिना माना के संभव नहीं।

माला में १०८ (+१ सुमेरु) दाने (मनके) होने चाहिए। ५४, २७ या ३० (इत्यादि) मनको की माला से भी जप किया जाता है। साधना विशेष के लिए मनकों की संख्या का विचार है। दो मनकों के बीच डोरी में गांठ होना जरूर है, आमतौर से ढाई गांठ की माला अच्छी होती है। अर्थात् डोरी में मनके पिरोते समय साधक हर मनके के बाद ढाई गांठ लगाए। मनके पिरोते समय अपने इष्टदेव का जप करते रहना चाहिए। सफेद डोरी शान्ति, सिद्धि आदि शुभ कार्यों के लिए प्रयाग करनी चाहिए। लाल धागे से वशीकरण आदि तथा काले धागे से पिरोई गई माला द्वारा मारण कर्म किये जाते हैं।

माला पिरोते समय मुख और पुछ का ध्यान रखना चाहिए। मनके के माटे वाले सिरे को मुख तथा पतले किनारे को पुछ कहते हैं। माला पिरोते समय मनकों के मुख से मुख तथा पुछ से पुछ मिलाकर पिरोने चाहिए।

मनके किसी भी चीज (प्लास्टिक इत्यादि छोड़कर) के हों मगर खंडित नहीं होने चाहिए।

रुद्राक्ष की माला भगवान् शंकर को प्रिय है और इसे एज़ ए डिफ़ाल्ट सभी देवी देवताओं की पूजा आराधना प्रयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष पर जप करने से अनन्त गुना (अन्य सभी मालाओं की तुलना में बहुत अधिक) फल मिलता है। इसे धारण करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जिस माला को धारण करते हैं उस पर जप नहीं करते लेकिन उसी जाति (किस्म) कि दूसरी माला पर जप कर सकते हैं।


जप करते समय माला गोमुखी या किसी वस्त्र से ढकी होनी चाहिए अन्यथा जप का फल चोरी हो जाता है। जप के बाद जप-स्थान की मिट्टी मस्तक पर लगा लेनी चाहिए अन्यथा जप का फल इन्द्र को चला जाता है।

प्रातःकाल जप के समय माला नाभी के समीप होनी चाहिए, दोपहर में हृदय और शाम को मस्तक के सामने।

जप में तर्जनी अंगुली का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए। इसलिए गोमुखी के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बाहर निकलकर जप करना चाहिए। अभिचार कर्म में तर्जनी का प्रयोग होता है।

जप में नाखून का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए।
सुमेरु के अगले दाने से जप आरम्भ करे, माला को मध्यमा अंगुली के मघ्य पोर पर रख कर दानों को अंगूठे की सहायता से अपनी ओर गिराए। सुमेरु को नहीं लांघना चाहिए। यदि एक माला से अधिक जप करना हो तो, सुमेरु तक पहुंच कर अंतिम दाने को पकड़ कर, माला पलटी कर के, माला की उल्टी दिशा में, लेकिन पहले की तरह ही जप करना चाहिए।

देवता विषेश के लिए माला का चयन करना चाहिए-
हाथी दांत की माला गणेशजी की साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

लाल चंदन की माला गणेशजी व देवी साधना के लिए उत्तम है।

तुलसी की माला से वैष्णव मत की साधना होती है (विष्णु, राम व कृष्ण)।

मूंगे की माला से लक्ष्मी जी की आराधना होती है। पुष्टि कर्म के लिए भी मूंगे की माला श्रेष्ठ होती है।

मोती की माला वशीकरण के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

पुत्र जीवा की माला का प्रयोग संतान प्राप्ति के लिए करते हैं।

कमल गट्टे की माला की माला का प्रयोग अभिचार कर्म के लिए होता है।

कुश-मूल की माला का प्रयोग पाप-नाश व दोष-मुक्ति के लिये होता है।

हल्दी की माला से बगलामुखी की साधना होती है।

स्फटिक की माला शान्ति कर्म और ज्ञान प्राप्ति; माँ सरस्वती व भैरवी की आराधना के लिए श्रेष्ठ होती है।

चाँदी की माला राजसिक प्रयोजन तथा आपदा से मुक्ति में विशेष प्रभावकरी होती है।

जप से पूर्व निम्नलिखित मंत्र से माला की वन्दना करनी चाहिए
(साधना या देवता विशेष के लिए अलग-अलग माला-वन्दना होती है)
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणी।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

4…  अथर्ववेद के प्रथम कांड  एक  मन्त्र में यह कहा  गया  है  की    
जिस प्रकार नदी  अपने प्रवाह से फेन को एक देश से दुसरे देश में पहुचा देती है ,जिस प्रकार अग्नि आदि देवताओ को दी  हुई धृत आदि रूप हवी ,राक्षसों को व पिशाचो को एक स्थान से दुसरे स्थान पर पहुचा दे   ।।
   तदन्तर  जिसमे  अभिचार कर्म किया है वः व्यक्ति अपने अभिचार कर्म के निष्फल होने से यह मेरे पास   आ कर स्तुति   करे अर्थात अग्नि की  शरण  में आकर अग्नि की  ही सेवा करे । और जिस व्यक्ति ने दुसरे के उपद्रव को दूर करने के लिए यह हवी दी है ,हे अग्ने आदि देव ! वः व्यक्ति उपद्र्व्रहित होकर आपकी स्तुति करे ।
                             सब कामनाओ को पाने के लिए आग्नेयी महा शांति  का वर्णन है । फिर नक्षत्र ,ग्रह अथवा उपग्रहो से उत्पन्न हुए भ्र्यार्थ अथवा रोग ग्रस्त पुरुष के भी और रोगों की शांति के लिए भार्गवी महा शांति का विधान है ।ब्रह्म तेजकी चाहने वलेके वस्त्र खट्वा आदि के अग्नि से जलने पर ब्राह्मी महा शांति का विधान है ।राज्य लक्ष्मी और ब्रह्म तेज पाने वलेकी बार्हस्पत्य महा शांति का वर्णन है ।फिर प्रजा ,पशु और अन्न्की प्राप्ति के लिए और संतंक्ष्य्की निवृति के लिए प्रजप्त्याका ,शुद्धि चाहनेवाले के लिए सावित्री का ,छन्द्शाश्त्र और ब्रह्म तेज को चाहनेवाले के लिए गायत्री का ,सम्पति को चाहनेवाले अभिचर करते हुए अथवा दुसरे के लिए अभिचार करते हुए के लिए आन्गिरसी महाशांति का विधान है ।फिर विजय बल और पुष्टि चाहनेवाले के लिए और शत्रुओ को उद्विग करना चाहनेवाले ले लिए एंड्री महा शांति का विधान है ,अद्रुत विकारो की निवृति चाहने वाले के लिए और राज्य चाहने वाले के लिए महेंद्री का .धन चाहने वाले और धन क्षय को दूर करना चाहने वाले के लिए कौबेरी महा शांति का विधान है ,विद्या ,तेज .धन और आयु चाहनेवाले के लिए आदित्या का अन्न चाहने वाले के लिए वैष्णवी का ,ऐश्वर्य चाहनेवाले के लिए और वास्तु संस्कार कर्म में वस्तोष्प्त्या का रोगार्ट और आप्द्र ग्रस्त लिए रौद्री महाशांति का वर्णन है ।फिर विज्यभिलाशिकी अपराजिता महाशांति का वर्णन है ,फिर महामारी यम भय अर्थात महामारी आदि के समय की जाने वाली याम्य महाशांति का जलमय अथ्न्त जल सावन के समय की जानेवाली वारुनी महाशांति और आंधी के भय से की जाने वाली वायव्य महाशांति का वर्णन है ।फिर कुल क्षय की निवृति के लिए संतति नामक महा शांति का वर्णन है ,बालक की व्याधियो  को दूर करने के लिए कुमारी महाशांति है ,पाप्ग्रस्त्के पापको शांत करने के लिए नैरुत्यी म्हाशामती है ,फिर बल चाहनेवालो के लिए मरुद्ग्नी महा शांति के लिए ,फिर भूमि के चाहनेवालो के लिए उपयोगिनी पार्थ्वी महाशांति है 

मूल मंत्रो को जानने के लिए प्रतीक्षा करे   । धन्यवाद    

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