Google+ Followers

Friday, 14 December 2012

महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज



.
महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज वर्तमान युग के विश्वविख्यात भारतीय प्राच्यविद् तथा मनीषी रहे हैं। इनकी ज्ञान-साधना का क्रम वर्तमान शताब्दी के प्रथम दशक से आरम्भ हुआ और प्रयाण-काल तक वह अबाधरूप से चलता रहा। इस दीर्घकाल में उन्होंने पौरस्त्य तथा पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की विशिष्ट चिन्तन पद्धतियों का गहन अनुशीलन कर, दर्शन और इतिहास के क्षेत्र में जो अंशदान किया है उससे मानव-संस्कृति तथा साधना की अंतर्धाराओं पर नवीन प्रकाश पड़ा है, नयी दृष्टि मिली है।

उन्नीसवीं शती के धार्मिक पुनर्जागरण और बीसवीं शती के स्वातन्त्र्य-आन्दोलन से अनुप्राणित उनकी जीवन-गाथा में युगचेतना साकार हो उठी है। प्राचीनता के सम्पोषक एवं नवीनता के पुरस्कर्ता के रूप में कविराज महोदय का विराट् व्यक्तित्व संधिकाल की उन सम्पूर्ण विशेषताओं से समन्वित है, जिनसे जातीय-जीवन प्रगति-पथ पर अग्रसर होने का सम्बल प्राप्त करता रहा है। गोपीनाथ कविराज संस्कृत के विद्वान और महान दार्शनिक थे। यह बंगाली थे, और इनके पिताजी का नाम वैकुण्ठनाथ बागची था। महामहोपाध्याय पद्मविभूषण पंडित गोपीनाथ कविराज उन ऋषिकल्प ज्ञानी महापुरुषों में अग्रणी थे जिनका अवतरण सहस्राब्दियों बाद कभी-कभी हुआ करता है | उनमें पांडित्य परिपूर्ण भाव से विराजित था, वेद,शास्त्र,पुराण,आगम-निगम तथा तंत्रादि का भारतीय वांग्मय में जो विपुल विस्तार है वह सब का सब उनके चित्केंद्र में एक जगह सिमट आया था | सागर की थाह लगायी जा सकती है परन्तु जो ज्ञान का सागर उनमें लहरा रहा था उसकी थाह नहीं है | उनका पंचभौतिक शरीर तो अब तिरोहित है परन्तु अपनी अमूल्य कृतियों के रूप में वे अनंत काल तक जीवित और साधकों का मार्गदर्शन करते रहेंगे | सम्मान

महामहोपाध्याय (1934)
पद्मविभूषण (1964)
डी लिट् (1947), (इलाहाबाद विश्वविद्यालय
साहित्य वाचस्पति (1965), उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा
देशिकोत्तम (1976), विश्व भारती द्वारा
डी लिट (1956) (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
2सुंदराचार्य या सच्चिदानंद: इस नाम से एक महापुरुष का आविर्भाव हुआ था। यह जालंधर में रहते थे। इनके शिष्य थे विद्यानंदनाथ। सुंदराचार्य अर्थात् सचिच्दानंदनाथ की 'ललितार्चन चंद्रिका' एवं 'लधुचंद्रिका पद्धति' प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
विद्यानंदनाथ का पूर्वनाम श्रीनिवास भट्ट गोस्वामी था। यह कांची (दक्षिण भारत) के निवासी थे। इनके पूर्वपुरुष समरपुंगव दीक्षित अत्यंत विख्यात महापुरुष थे। श्रीनिवास तीर्थयात्रा के निमित जालंधर गए थे और उन्होंने सच्चिदानंदनाथ से दीक्षा ग्रहण कर विद्यानंद का नाम धारण किया। गुरु के आदेश से काशी आकर रहने लगे। उन्होंने बहुत से ग्रंथों की रचना की जिनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं- 'शिवार्चन चंद्रिका' , 'क्रमरत्नावली' , ' भैरवार्चापारिजात' , 'द्वितीयार्चन कल्पवल्ली' , 'काली-सपर्या-क्रम-कल्पवल्ली', 'पंचमेय क्रमकल्पलता' , 'सौभाग्य रत्नाकर' (36 तरंग में), 'सौभग्य सुभगोदय' , 'ज्ञानदीपिका' और 'चतु:शती टीका अर्थरत्नावली' । सौभाग्यरत्नाकर, ज्ञानदीपिका और अर्थरत्नावली सम्पूर्णानन्दविश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित हैं ।
नित्यानंदनाथ: इनका पूर्वनाम नाराणय भट्ट है। उन्होंने दुर्वासा के 'देवीमहिम्र स्तोत्र' की टीका की थी। यह तन्त्रसङ्ग्रह में प्रकाशित है । तन्त्रसङ्ग्रह सम्पूर्णानन्दविश्वविद्यालय से प्रकाशित है ।उनका 'ताराकल्पलता पद्धति' नामक ग्रंथ भी मिलता है।
सर्वानंदनाथ: इनका नाम उल्लेखनीय है। यह 'सर्वोल्लासतंत्र' के रचयिता थे। इनका जन्मस्थान मेहर प्रदेश (पूर्व पाकिस्तान) था। ये सर्वविद्या (दस महाविद्याओं) के एक ही समय में साक्षात् करने वाले थे। इनका जीवनचरित् इनके पुत्र के लिखे 'सर्वानंद तरंगिणी' में मिलता है। जीवन के अंतिम काल में ये काशी आकर रहने लगे थे। प्रसित्र है कि यह बंगाली टोला के गणेश मोहल्ला के राजगुरु मठ में रहे। यह असाधरण सिद्धिसंपन्न महात्मा थे।
निजानंद प्रकाशानंद मल्लिकार्जुन योगीभद्र: इस नाम से एक महान् सिद्ध पुरुष का पता चलता है। यह श्रीक्रमोत्तम नामक एक चार उल्लास से पूर्ण प्रसिद्ध ग्रंथ के रचयिता थे। श्रीक्रमोत्तम श्रीविद्या की प्रासादपरा पद्धति है।
ब्रह्मानंद: इनका नाम पहले आ चुका है। प्रसिद्ध है कि यह पूर्णनंद परमहंस के पालक पिता थे। शिक्ष एवं दीक्षागुरु भी थे। 'शाक्तानंद तरंगिणी' और'तारा रहस्य' इनकी कतियाँ हैं।
पूर्णानंद : 'श्रीतत्त्वचिंतामणि' प्रभृति कई ग्रंथों के रचयिता थे। श्रीतत्वचिन्तामणि का रचनाकाल 1577 0 है। 'श्यामा अथवा कालिका रहस्य' शाक्त क्रम 'तत्वानंद तरंगिणी', 'षटकर्मील्लास' प्रभृति इनकी रचनाएँ हैं। प्रसिद्ध 'षट्चक्र निरूपण' 'श्रीतत्वचितामणि' का षष्ठ अध्याय है।
देवनाथ ठाकुर तर्कपंचानन : ये 16वीं शताब्दी के प्रसिद्ध ग्रंथकार थे। इन्होंने 'कौमुदी' नाम से सात ग्रंथों की रचना की थी। ये पहले नैयायिक थे और इन्होंने 'तत्वचिंतामणि' की टीका आलोक पर परिशिष्ट लिखा था। यह कूचविहार के राजा मल्लदेव नारायण के सभापंडित थे। इनके रचित 'सप्तकौमुदी' में 'मंत्रकौमुदी' एवं 'तंत्र कौमुदी' तंत्रशास्त्र के ग्रंथ हैं। इन्होंने 'भुवनेश्वरी कल्पलता' नामक ग्रंथ की भी रचना की थी।
गोरक्ष: प्रसिद्ध विद्वान् एवं सिद्ध महापुरुष थे। 'महार्थमंजरी' नामक ग्रंथरचना से इनकी ख्याति बढ़ गई थी। इनके ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं- "महार्थमंजरी' और उसकी टीका 'परिमल' , 'संविदुल्लास' , 'परास्तोत्र' , 'पादुकोदय' , 'महार्थोदय' इत्यादि।
'संवित्स्तोत्र' के नाम से गोरक्ष के गुरु का भी एक ग्रंथ था। गोरक्ष के गुरु ने 'ऋजु विमर्शिनी' और 'क्रमवासना' नामक ग्रंथों की भी रचना की थी।
सुभगानंद नाथ ओर प्रकाशानंद नाथ: सुभगांनंद केरलीय थे। इनका पूर्वनाम श्रीकंठेश था। यह कश्मीर में जाकर वहाँ के राजगुरु बन गए थे। तीर्थ करने के लिये इन्होंने सेतुबंध की यात्रा भी की जहाँ कुछ समय नृसिंह राज्य के निकट तंत्र का अध्ययन किया। उसके बाद कादी मत का 'षोडशनित्या' अर्थात् तंत्रराज की मनोरमा टीका की रचना इन्होंने गुरु के आदेश से की। बाईस पटल तक रचना हो चुकी थी, बाकी चौदह पटल की टीका उनके शिष्य प्रकाशानंद नाथ ने पूरी की। यह सुभगानंद काशी में गंगातट पर वेद तथा तंत्र का अध्यापन करते थे। प्रकाशानंद का पहला ग्रंथ 'विद्योपास्तिमहानिधि' था। इसका रचनाकाल 1705 0 है। इनका द्वितीय ग्रंथ गुरु कृत मनोरमा टीका की पूर्ति है। उसका काल 1730 0 है। प्रकाशानंद का पूर्वनाम शिवराम था। उनका गोत्र 'कौशिक' था। पिता का नाम भट्टगोपाल था। ये त्र्यंबकेश्वर महादेव के मंदिर में प्राय: जाया करते थे। इन्होंने सुभगानंद से दीक्षा लेकर प्रकाशानंद नाम ग्रहण किया था।
कृष्णानंद आगमबागीश : यह बंग देश के सुप्रसिद्ध तंत्र के विद्वान् थे जिनका प्रसिद्ध ग्रंथ 'तंत्रसार' है। किसी किसी के मतानुसार ये पूर्णनंद के शिष्य थे परंतु यह सर्वथा उचित नहीं प्रतीत होता। ये पश्वाश्रयी तांत्रिक थे। कृष्णानंद का तंत्रसार आचार एवं उपासना की दृष्टि से तंत्र का श्रेष्ठ ग्रंथ है।
महीधर: काशी में वेदभाष्यकार महीधर तंत्रशास्त्र के प्रख्यात पंडित हुए हैं। उनके ग्रंथ 'मन्त्रमहोदधि' और उसकी टीका अतिप्रसिद्ध हैं (रचनाकाल 1588 0)
नीलकंठ: महाभारत के टीकाकार रूप से महाराष्ट्र के सिद्ध ब्रह्मण ग्रंथकार। ये तांत्रिक भी थे। इनकी बनाई 'शिवतत्वामृत' टीका प्रसिद्ध हैं। इसका रचनाकाल 1680 0 है।
आगमाचार्य गौड़ीय शंकर: आगमाचार्य गौड़ीय शंकर का नाम भी इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। इनके पिता का नाम कमलाकर और पितामह का लंबोदर था। इनके प्रसिद्ध ग्रंथ तारा-रहस्य-वृत्ति और शिवार्च(र्ध)न माहात्म्य (सात अध्याय में) हैं। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा रचित और भी दो तीन ग्रंथों का पता चलता है जिनकी प्रसिद्धि कम है। भास्कर राय : 18वीं शती में भास्कर राय एक सिद्ध पुरुष काशी में हो गए हैं जो सर्वतंत्र स्वतंत्र थे। इनकी अलौकिक शक्तियाँ थी। इनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं- सौभाग्य भास्कर' (यह ललिता सहस्र-नाम की टीका है, रचनाकाल 1729 0) 'सौभाग्य चंद्रोदय' (यह सौभाग्यरत्नाकर की टीका है।) 'बरिबास्य रहस्य' , 'बरिबास्यप्रकाश' ; 'शांभवानंद कल्पलता'(भास्कर शाम्भवानन्दकल्पलता के अणुयायी थे - ऐसा भी मत है), 'सेतुबंध टीका' (यह नित्याषोडशिकार्णव पर टीका है, रचनाकाल 1733 0); 'गुप्तवती टीका' (यह दुर्गा सप्तशती पर व्याख्यान है, रचनाकाल 1740 0); 'रत्नालोक' (यह परशुराम 'कल्पसूत्र' पर टीका है); 'भावनोपनिषद्' पर भाष्य प्रसिद्व है कि 'तंत्रराज' पर भी टीका लिखी थी। इसी प्रकार 'त्रिपुर उपनिषद्' पर भी उनकी टीका थी । भास्कर राय ने विभिन्न शास्त्रों पर अनेक ग्रंथ लिखे थे।
प्रेमनिधि पंथ : इनका निवास कूर्माचल (कूमायूँ) था। यह घर छोड़कर काशी में बस गए थे। ये कार्तवीर्य के उपासक थे। थोड़ी अवस्था में उनकी स्त्री का देहांत हुआ। काशी आकर उन्होंने बराबर विधासाधना की। उनकी 'शिवतांडव तंत्र' की टीका काशी में समाप्त हुई। इस ग्रंथ से उन्हें बहुत अर्थलाभ हुआ। उन्होने तीन विवाह किए थे। तीसरी पत्नी प्राणमंजरी थीं। प्रसिद्व है कि प्राणमंजरी ने 'सुदर्शना' नाम से अपने पुत्र सुदर्शन के देहांत के स्मरणरूप से तंत्रग्रंथ लिखा था। यह तंत्रराज की टीका है।प्रेमनिधि ने 'शिवतांडव' टीका ' मल्लादर्श', 'पृथ्वीचंद्रोदय' और 'शारदातिलक' की टीकाएँ लिखी थीं। उनके नाम से 'भक्तितरंगिणी' , 'दीक्षाप्रकाश' (सटीक) प्रसिद्ध है। कार्तवीर्य उपासना के विशय में उन्होंने 'दीपप्रकाश नामक' ग्रथ लिखा था। उनके 'पृथ्वीचंद्रादय' का रचनाकाल 1736 0 है। कार्तवीर्य पर 'प्रयोग रत्नाकर' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ है।
'श्रीविद्या-नित्य-कर्मपद्धति-कमला' तंद्त्रराज से संबंध रखता है। वस्तुत: यह ग्रंथ भी प्राणमंजरी रचित है।
उमानंद नाथ: यह भासकर राय के शिष्य थे और चोलदेश के महाराष्ट्र राजा के सभापंडित थे। इनके दो ग्रंथ प्रसिद्ध हैं- 1. हृदयामृत (रचनाकाल 1742 0), 2- नित्योत्सवनिबंध (रचनाकाल 17450)
रामेश्वर: तांत्रिक ग्रंथकार। इन्होंने 'परशुराम-कल्पसूत्र-वृति' की रचना की थी जिसका नाम 'सौभागयोदय' है। यह नवीन ग्रंथ है जिसका रचनाकाल 1831 0 है।
शंकरानंद नाथ: 'सुंदरीमहोदय' के रचयिता थे। यह प्रसिद्ध मीमांसक थे। सुप्रसिद्ध पंडित भट्ठ दीपिकादिकर्ता खंडदेव के शिष्य थे। इनका नाम पहले कविमंडन था। इनके मीमांसाशास्त्र का ग्रंथ भी प्रसिद्ध हैं। इन्होंने धर्मशास्त्र में भी अच्छी गति प्राप्त की थी। यह त्रिपुरा के उपासक थे। शाक्त दीक्षा लेने के अनंतर यह शंकरानंद नाथ नाम से प्रसिद्ध हुए।
अप्पय दीक्षित: शैव मत में अप्पय दीक्षित के बहुत से ग्रंथ हैं। समष्टि में शताधिक ग्रंथों की दन्होंने विभिन्न विषयों से संबंधित रचनाएँ की थी। 'शिवाद्वैत निर्णय' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ इन्हीं का है।
माधवानंद नाथ: इस नाम से एक तंत्राचार्य लगभग 100 वर्ष पूर्व काशी में प्रकट हुए थे इनके गुरू यादवानंद नाथ थे। इन्होंने 'सौभागय कल्पद्रुम' की रचना की थी जो 'परमानंद तंत्र' के अनुकूल ग्रंथ है। यह ग्रंथ काशी में लिखा गया था।
क्षेमानंद: इन्होंने पूर्वोक्त 'सौभाग्य कल्पद्रुम' के ऊपर 'कल्पलतिका' नाम की टीका लिखी थी। इनका 'कल्पद्रुम सौरभ' टीका रूप से प्रसिद्ध है।
गीर्वाणेन्द्र सरसवती और शिवानंद योगींद्र: ये दोनों संन्यासौ 'प्रपंचसार' के टीकाकार के रूप में प्रसिसद्ध हुए हैं। यह प्रकाशित है। गीर्वाणेन्द्र के ग्रंथ का नाम 'प्रपंचसार संग्रह' और शिवानंद के ग्रंथ का नाम 'प्रपंच उद्योतारूण' है।
रघुनाथ तर्कवाशीग: वंग देश में इस नाम के तंत्र के एक प्रसिद्ध आचार्य थे। ये पूर्व बंगाल में नपादी स्थान के थे। इनका ग्रंथ है 'आगम-तर्क-विलास' जो पाँच अध्यायों में विभक्त है। इसका रचनाकाल 1609 शकाब्द (1687) है।
महादेव विद्यावागीश: प्रसिद्ध वगीय आचायर्य जिन्होंने 'आनंदलहरी' पर 'तत्वबोधिनी' शीर्षक टीका की रचना की। (रचनाकाल 1605 0)
यदुनाथ चक्रवर्ती: बंगीय विद्वान् यदुनाथ चक्रवर्ती के 'पंचरत्नाकर' और ' आगम कल्पलता' किसी समय पूर्व भारत में अति प्रसिद्ध ग्रंथ माने जाते थे।
नरसिंह ठाकुर: मिथिला के नरसिंह ठाकुर 'तारामुक्ति सुधार्णाव' लिखकर जगद्विख्यात हुए यह प्राय: तीन सौ वर्ष पूर्व मिथिला में तंत्रविद्या की साधना करते थे।
गोविद न्यायवागीश: यह 'मंत्रार्थ दीपिका' नामक ग्रंथ के लिये प्रसिद्ध हैं।
काशीनाथ तर्कालंकार: इनका 'श्यामा सपर्याविधि' प्रसिद्ध ग्रंथ है। यह काशी में रहे और एक महाराष्ट्रीय तांत्रिक ब्राह्मण विद्वान् थे। उनका दीक्षांत नाम शिवानंद नाथ है। ये दक्षिणाचारावलंबी थे और वामाचार का उन्होंने घोर विशेध किया। अनके ग्रंथों में 'ज्ञानार्णाव' की टीका (23 पटल में) गूढार्थ आदर्श हौर दक्षिणाचार की 'तंत्रराज टीका' प्रसिद्ध हैं। इनका 'चक्रसंकेत चंद्रिका' 'योगिनीहृदय दीपिका' का संक्षिप्त विवरण है। इन्होंने छोटे बड़े बहुसंख्यक ग्रंथ लिखे थे जिनमें से 'तंत्रसिद्धांत कौमुदी' , 'मंत्रसिद्धांत मंजरी', 'तंत्रभूषा', 'त्रिपुरसुंदरी अर्चाक्रम' , 'कर्पूंरंस्तवदीपिका', 'श्रीविद्यामंत्रदीपिका' , 'वामाचारमत-खंडनफ़' मंत्रचंद्रिकाफ (11उल्लास में), 'संभवाचार्य कौमुदी' (पाँच प्रकाश में), 'शिवभक्ति रसायन', 'शिवाद्वैत प्रकाशिका' (तीन उल्लास में), 'शिवपूजा तरंगिणी', 'कौलगजमर्दन', 'मंत्रराज समुच्चय' , इत्यादि प्रसिद्ध है।
काशीनाथ ने अपने 'वैदिक अधिकार निर्णय' के विषय में कहा है कि तंत्रोपासना के चार भेदों के अनुसार चार प्रकार के तांत्रिक उल्लेखयोग्य हैं-
1. शुद्ध वैदिक (यह तंत्र की गंध भी सहन नहीं कर सकते),
2. तांत्रिक वैदिक,
3. शुद्ध तांत्रिक (यह तंत्र में अधिक विशिष्टता रखते हैं और वेद की गंध सहन नही कर सकते; यथा पाशुपत मतावलंबी),
4. वैदिक तांत्रिक (यह वेदांग के पोषक और तंत्र को उसका फ़ अंगीफ़ मानते हैं)
तंत्रसाहित्य और उसके साधकों का यह अत्यंत संक्षिप्त विवरण है। इसमें बहुत से ग्रंथों के नाम दूटे हुए हैं, परंतु मुख्य एवं विशिष्ट नाम दे दिए गए हैं।
3…तंत्रसाहित्य के विशिष्ट आचार्य
मध्ययुग में तांत्रिक साधना एवं साहित्यरचना में जितने विद्वानों का प्रवेश हुआ था। उनमें से कुछ विशिष्ट आचार्यो का संक्षिप्त विवरण यहाँ दिया जा रहा हैं।
प्राचीन समय के दुर्वासा, अगस्त्य, विश्वामित्र, परशुराम, बृहस्पति, वसिष्ठ, नंदिकेश्वर, दत्तात्रेय प्रभृति ऋषियों का विवरण देना यहाँ अनावश्यक हैं।
ऐतिहासिक युग में श्रीमच्छङ्कराचार्य के परम गुरु गौडपादाचार्य का नाम उल्लेखयोय है। उनके द्वारा रचित ' सुभगोदय स्तुति' एवं 'श्रीविद्यारत्नसूत्र' प्रसिद्ध हैं। इस विषय में पहले उल्लेख किया जा चुका है।
लक्ष्मणदेशिक: ये शादातिलक , ताराप्रदीप आदि ग्रथों के रचयिता थे। इनके विषय में यह परिचय मिलता है कि ये उत्पल के शिष्य थे।
शंकराचार्य: वेदांगमार्ग के संस्थापक सुप्रसिद्ध भगवान् शंकराचार्य वैदिक संप्रदाय के अनुरूप तांत्रिक संप्रदाय के भी उपदेशक थे। ऐतिहासिक दृष्टि से पंडितों ने तांत्रिक शंकर के विषय में नाना प्रकार की आलोंचनाएँ की हैं। कोई दोनों को अभिन्न मानते हैं और कोई नहीं मानते है। उसकी आलोचना यहाँ अनावश्यक है। परंपरा से प्रसिद्ध तांत्रिक शंकराचार्य के रचित ग्रंथ इस प्रकार हैं-
1-प्रपंचसार, 2-परमगुरु गौडपाद की सुभगोदय स्तुति की टीका, 3-ललितात्रिशतीभाष्य, 4- आनंदलहरी अथवा सौंदर्यलहरी नामक स्तोत्र 5- क्रमस्तुति । किसी-किसी के मत में 'कालीकर्पूरस्तव' की टीका भी शंकराचार्य ने बनाई थी।
पृथिवीधराचार्य अथवा पृथ्वीधराचार्य : यह शंकर के शिष्कोटि में थे। इन्होंने भुवनेश्वरी स्तोत्र तथा भुवनेश्वरी रहस्य की रचना की थी। भुवनेश्वरी स्तोत्र राजस्थान से प्रकाशित है। वेबर ने अपने कैलाग में इसका उल्लेख किया है। भुवनेश्वरी रहस्य वाराणसी में भी उपलब्ध है और उसका प्रकाशन भी हुआ है। भुवनेश्वरी-अर्चन-पद्धति नाम से एक तीसरा ग्रंथ भी पृथ्वीधराचार्य का प्रसिद्ध है।
चरणस्वामी: वेदांत के इतिहास में एक प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं। तंत्र में इन्होंने 'श्रीविद्यार्थदीपिका' की रचना की है। 'श्रीविद्यारत्न-सूत्र-दीपिका' नामक इनका ग्रंथ मद्रास लाइब्रेरी में उपलब्ध है। इनका 'प्रपंच-सार-संग्रह' भी अति प्रसिद्ध ग्रंथ है।
सरस्वती तीर्थ: परमहंस परिब्राजकाचार्य वेदांतिक थे। यह संन्यासी थे। इन्होंने भी 'प्रपंचसार' की विशिष्ट टीका की रचना की।
राधव भट्ट: 'शादातिलक' की 'पदार्थ आदर्श' नाम्नी टीका बनाकर प्रसिद्ध हुए थे। इस टीका का रचनाकाल सं0 1550 है। यह ग्रंथ प्रकाशित है। राधव ने 'कालीतत्व' नाम से एक और ग्रंथ लिखा था। परंतु उसका अभी प्रकाशन नहीं हुआ।
पुण्यानंद: हादी विद्या के उपासक आचार्य पुण्यानंद ने 'कामकला विलास' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी। उसकी टीका 'चिद्वल्ली' नाम से नटनानंद ने बनाई। पुण्यानंद का दूसरा ग्रंथ 'तत्वविमर्शिनी' है। यह अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है।
अमृतानंदनाथ: अमृतानदनाथ ने 'योगिनीह्रदय' के ऊपर दीपिका नाम से टीकारचना की थी। इनका दूसरा ग्रंथ 'सौभाग्य सुभगोदय' विख्यात है। यह अमृतानंद पूर्ववर्णित पुणयानंद के शिष्य थे।
त्रिपुरानंद नाथ: इस नाम से एक तांत्रिक आचार्य हुए थे जो ब्रह्मानंद परमहंस के गुरु थे। त्रिपुरानंद की व्यक्तिगत रचना का पता नहीं चलता। परंतु ब्रह्मानंद तथा उनके शिष्य पूर्णानंद के ग्रंथ प्रसिद्ध हैं।

No comments:

Post a Comment